Sunday, September 22, 2013

नहीं आती हैं आवाजें..

ऑगन के बीचो- बीच बना तुलसी चौरा
अब रहने लगा है खाली चापाकल का चबूतरा
बूढी बा दीवार से सटकर किवाड़ के पास
बैठी रहती है पहर भर और दोपहर भर



नही खनकती हैं अब चूड़िया
ना हीं आवाज आती है झगड़ने की ना हंसने की
ना चिल्लाने की
ना हीं आती है आवाज  बर्तनों के टकराने की

सांय सांय करती आवाजें घुमा करती हैं
और पैर पसारे बैठी रह्ती है घर भर में
बा अपनी खाली ऑखों से निहारती रहती है
बंगलिया सड़क को और उठ दौर जाती है
आंगन के बाहर दालान पर
जब वो सुनती है किसी रिक्शे, तांगे या टेम्पो की आवाज
और बार- बार और कई बार करती है ये आवाज करती हैं उसको निराश

बस कभी-कभी वो डाक बाबू आते हैं साईकिल की घंटी टनटनाते हैं
और बा को चंद कागज के टुकड़े थमा जाते हैं
जिन्हे वो कई तहो में मोड़कर बांध लेती है अपनी साड़ी की खूंट से
पर वो अभी भी निहारती रहती है बंगलिया सड़क को

और हर रोज धूप दिखाती है अचार के मर्तबानो को
वो लिखवाती है पाती महिने में कई बार और उसे मिलता
है जवाब कभी कभार
परेशानियों, मुश्किलों से भरे जवाब कर देते हैं उसको
बहुत ज्यादा परेशान और वो हो जाती है उदास और निराश
फिर वो पहर भर और दोपहर भर बैठी रहती है
बेना डोलाती हुई दिवार से सटकर किवाड़ के पास.

---------------------सोनम-----------------------












Friday, September 20, 2013

पल ठहर जाते हैं...

तमाम पल ठहर जाते हैं और हम आगे बढ़ जाते हैं
फिर खुद को यादों के झुरमुटों मे. पाते हैं
उन पलों में वापस नहीं जा सकते पर 
उन पलों में जिया जा सकता है
तब जब हम  बिखर रहे होते हैं
तूफानों में बह रहे होते हैं
कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमारे जेहन में बस जाते हैं
और इन पलो में जो हमारे साथ होता है वो और कोई नहीं
वही साथ दोस्त कहलाता है
जिस रिश्ते की जड़ हमारे वजूद को बॉधे रखती है
और जिसका एहसास हमे सम्भाले रखता है
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो कभी खत्म नहीं होता
कोई आगे बढ़ जाता है कोई पीछे छुट जाता है
कोई उत्तर में होता है और कोई खुद को सुदुर दक्षिण में पाता है
पर दोस्ती में बिताये गये पल सुनहरे होते हैं
जिन्हें वक्त चंदन की डिबिया में सहेज कर रख देता है
जिसे हम जब चाहे खोलकर उसकी महक से सराबोर हो जाएं
क्योंकि पल खत्म  नहीं  होते ठहर जाते हैं
वैसे हीं जैसे दुख खत्म नहीं होता कम हो जाता है....