Friday, March 4, 2016

ढारे लगली नयना स नार

करे कोयली घमासान 
चनन घनन गछिया तही चढ़े करे कोयली 
घमासान 
कानन लगली खीझे लगली कोयली पिरितिया
ढारे लगली नयना स नार 
ब्रह्ममन बाबू के अंगन चनन घनी गछिया 

अचके में आयल कहार

सूतल छलियई  बाबा के  भवनवा बाबा के भवनवा
अचके में आयल कहार
चारी कहरिया चारी खरिया पाचम लोकनीया
संगही सहोदर भय
दुवारे छूटल असहर पसहर
दूरही छूटल परिबार 

हथवा में हॉत जा हमरे कटरिया तो बहा देती गोरवन खून हो कि कचौरी गली सुन कईले

जे.एन .यू

जे.एन .यू कुछ जबरदस्ती नही सिखाता हम खुद ब खुद बहुत कुछ सिख जाते हैं यहाँ की आबो हवा में, दूसरो की छल्लेदार बातो पर हम सोचना समझना शुरू कर देते हैं बजाय कि बस प्रभावित हो जाएँ किसी के मात्र कुछ कह देने भर से . हमे तमाम बनी बनाई सहमतियो में असहमति की आवाज सुनाई देने लगती है. हम हर बात को मानना छोडकर हर बात की वजह क्या है ये जानना शुरु कर देते हैं. हम वहम में नही वजह में जीना सीख जाते हैं. बड़े बड़े लोग मन की बात करते हैं हम मन की चाल चलना सिख जाते हैं. यहाँ हम बात काटना सिख जातेहैं. ये विरोधी का जे.एन. यूं है जहाँ हम पुरजोर तरीके से विरोध करना सिख जाते हैं. हमें हमारे खुद के होने का आत्मविश्वास देता है जे.एन.यूं..आजाद भारत में भी बहुत कुछ गुलाम है ये बात भी समझा देता है हमे जे एन यूं

Thursday, March 3, 2016

दबे पैरों से उजाला आ रहा है

दबे पैरों से उजाला आ रहा है
दबे पैरों से उजाला आ रहा है
फिर कथाओं को खँगाला जा रहा है
धुंध से चेहरा निकलता दिख रहा है
कौन क्षितिजों पर सवेरा लिख रहा है
चुप्पियाँ हैं जुबाँ बनकर फूटने को
दिलों में गुस्सा उबाला जा रहा है
दूर तक औ' देर तक सोचें भला क्या
देखना है बस फिजाँ में है घुला क्या
हवा में उछले सिरों के बीच ही अब
सच शगूफे सा उछाला जा रहा है
नाचते हैं भय सियारों से रँगे हैं
जिधर देखो उस तरफ कुहरे टँगे हैं
जो नशे में धुत्त हैं उनकी कहें क्या
होश वालों को सँभाला जा रहा है
स्थगित है गति समय का रथ रुका है
कह रहा मन बहुत नाटक हो चुका है
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी
प्रश्न सौ-सौ बार टाला जा रहा है
सेंध गहरी नींद में भी लग गई है
खीझती सी रात काली जग गई है
दृष्टि में है रोशनी की एक चलनी
और गाढ़ा धुआँ चाला जा रहा है