ये समय ऐसा चल रहा है, जब हमारे ये नई-पीढ़ी के नौजवान कुछ सीखने से ज्यादा
जताने को महत्व देते हैं, आरोप प्रत्यारोप इनके जीवन का हिस्सा हो
गया है, ...ये प्रवृति जो युवाओं में विकसित हो
रही है, जिसमे किसी विषय की गंभीरता को समझे बिना
...सिर्फ अपनी सतही समझदारी के स्तर पर फैसला सुना देना...ये बहुत गंभीर विषय और भयावह
मुद्दा है... डिजिटल जोक्स और रील के जमाने
में संवेदनाए, और मानवीय मूल्य के विषय इन्हे मज़ाक लगते
हैं, नॉलेज के मायने इनके लिए टेक्निकल ही हैं, साहित्य बोरिंग और यूसलेस है, सामाजिक सरोकार के मुद्दे इन्हे बकवास लगते हैं….ये सारे तथ्य किसी भी देश के सतत विकास के लिए बहुत
भयावह है.... सारे रेसौर्सेस, में
ह्यूमन रेसौर्स जैसा महत्वपूर्ण कुछ नही है....तमाम, इमराते, विज्ञान और मूर्तिया व्यर्थ हो जाएंगी यदि हम अपने
युवाओं और बच्चों को शिक्षा के सही मायने समय रहते नही सीखा पाएंगे तो सब कुछ धरा का
धारा रह जाएगा ....ये संवेदनाओं और समूहिक
सरोकार की कमी ही है कि आय दिन आत्म-हत्या जैसी घटनाएं हमें सुनाई देती हैं....इनसे
बचने के लिए हमें सीखना होगा अपने बच्चों को सिखाना होगा, अपने नौ-जवानों से बात करनी होगी और किताबों वाले
दिनों का आगाज़ करना होगा...जहाँ उपन्यास और कहानिया सिर्फ कोर्स-वर्क के अलावा हमारे
हर दिन का हिस्सा हो....इंसानिया की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए किताबों वाले दिनों
का होना बहुत जरूरी है.....