Sunday, October 16, 2011

नीली बस की यादें


कुछ नहीं भूलने वाली यादों के चलते भोपाल की सड़को पर साँप की तरह सरसराती इन नीली बसों ने मेरी जहऩ में एक खास जगह बना ली है। जिनमें कुछ ऐसी घटनायें घटी की मन को न चाहते हुए भी एकदम से अपनी तरफ खींच लिया।

वो नाराज थी

वो नाराज थी शुरु से हीं नाराज थी मैं जैसे हीं नीली बस में शाम को 6 बजे बैठी तारीख मुझे मेरी लापारवाहीं के चलते याद नहीं परंतु वो नाराज और एकदम गुस्से में थी मेरे बस में बैठने के थोड़ी देर के बाद हीं 22-23 साल या उससे भी कम की एक नवविवाहिता और उसका नवविवाहित पति मेरे बगल में आकर बैठे पर लड़की मेरे पास बैठी थी और पति से मुँहफेरकर वो मेरी तरफ मुँह फेरकर बैठ हुयी थी। उसके अनुसार वो पूरे साज-सज्जा में थी एकदम चमकती हुई साड़ी, लाल बिन्दीया डिजाईन वाली और माथे पर लाल चमकता सिंदूर और पैरों में रंगीन चमचमती सी नई चप्पल और साथ हीं चमकते बाजार की सस्ते आभूषणों से सजी हुयी वो लड़की मेरे आकर्षण का केन्द्र ना बनती अगर वो गुस्से में अपने पति से मैथलि में ना कहती हमरा नई टोकू यानि मुझसे बात मत करीये वो भी पूरे लहजे के साथ उसके इस एक शब्द ने जैसे मेरा ध्यान भंग कर दिया मैं जो अपने आप में व्यस्त खिड़की के बाहर की चहल-पहल को चलती बस से देखने में व्यस्त थी दोस्तों के दिन भर के आये हुए एसएमएम के जवाब देने में लगी थी एक दम से उसकी बातों को सुनकर मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान दौर गई और मैंने सब छोड़-छाड़ कर उसकी तरफ ध्यान केन्द्रित कर लिया। क्योंकि मैं जान गई थी वो लड़की मैथिल हैं और गुस्से में भी मेरी प्रिय मातृभाषा मैथिलि में बात कर रहीं है। उसके पति का कोई परिचित उस बस में मिल गया जो भोपाली स्टाईल में पूछ रहा था क्या हो गया भाभी जी को तूने जरुर न्यूमार्केट मे भारी शोपिंग नहीं करनी दी होगी और पेसे बचाने के चक्कर में भाभी को नाराज कर डाला। और अपनी इन अदाओँ से नाराज लड़की को रिझाने का असफल प्रयत्न कर रहा था पर मजाल थी कि भूल से भी उसके चेहरे पर मुस्कान की एक लहर दौर जाए। पति ने बार- बार उसका हाथ पकड़ा मुस्कुराया परंतु उसकी नाक-भौ जो सिकुड़ी थी वो जस की तस सिकुड़ी रही और अब तो इस रिझाने मनाने के कार्यक्रम में उसके आँखों से आँसू भी छलक पड़े जिससे उसने अपनी आँचल की कोड़ो से तत्काल पोंछ लिया परंतु उसके नाक फूल गये और गाल लाल हो गये। इसी बीच नीली बस झील को पार करती हुयी काली माँ के मंदिर पहुँच गयी बस में मौजूद सभी धार्मिक महिलाओं ने मंदिर की घंटी सुनकर प्रणाम किया पर उसने मंदिर की तरफ देखा भी नहीं इस नाराजगी के दौरान उसके पति ने अपने चाईना हैण्डसेट से उसको गीत भी सुनाये कुछ फोटो भी दिखाने की कोशिश की परंतु वो ना मानी। कई स्टापों से गुजरती हुई बस जब बस सुभाष नगर बस स्टाँप पर रुकी तो वह जल्दी से खड़ी हो गयी और मैथिली में यह बोलते हुए की इहै मे बईसाबइ लै आनने छलहों एगों टेम्पू नई कैल भेलन हमरा लै कहते हुए नीचे उतर गयी यानि की इसी बस में बिठाने के लिए मुझे लाए थे एक आँटो रिक्शा नहीं कर सकते थे मेरे लिए और जल्दी जल्दी बस से उतर कर आगे- आगे और उसका पति पीछे-पीछे चल दिये परंतु वो तब तक नहीं मानी थी मेरी नजरे उसकी चाल को देख रहीं थी की तभी बस नये यात्रियों को अपने सवार करती हुई चल दी और मैं उसकी बचकानी बातें और मासूम नाराजगी को सोच-सोच कर मुस्कुराती हुयी अपने प्रेस-काँम्पलेक्स बस स्टैण्ड पर उतर गयी। और मुझे पता चल चुका था कि आज जब आसमान में उड़ना हवाई जहाज पर बैठना आम बात हो गयी है तो इस पंख वाली दुनिया में वो आँटो में बैठने के लिये नाराज थी।

कुछ यादें

बहुत दिनों से एक कहानीयों की श्रृखंला शुरु करना चाह रही थी परंतु कार्य की व्यस्तता के चलते समय नहीं निकाल पायी परंतु आज जनसत्ता के एक लेख ने मुझे इस कदर उद्वेलित कर दिया कि मुझे लगा जो भी हो समय निकाल कर अगर प्रतिदिन सम्भव नहीं हो पाया तो कभी-कभार हीं सही अपने विचारों को अपने ब्लाग पर जरुर बिखेरुंगी जिससे कभी फुरसत में खुद के विचारों को पढ़कर कर समझ कर अपने राय विचार का आकलन कर पाउं अअनुभव के मुताबिक मैने महसूस किया कि कार्य की व्यस्तता के दौरान हीं हमारे दिमाग में कितने संवेदनशील और महत्वपूर्ण बाते, विचार और कुछ यादें कौंध जाती है जो कि जितनी तिब्रता से कौंधती हैं उतनी हीं तिब्रता से हमारे दिमाग से फिसल भी जाती हैं। शायद ये विचार ये परखने की कोशिश करते हैं की हमको इनकी कदर हैं कि नही जिनकों इनकी कदर होती है वे अपने हर एक विचार और अनुभवों को कलमबद्ध करते चले जातें हैं जिसके कई उदाहरण हमारे महान लेखकों की श्रृखंला है।

खैर इन बातों के पहले मैनें जिस कहानी श्रृखंला की चर्चा की थी उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए बताना चाहूंगी कि ये कोई मेरे मन से गढ़ी हुयी कहानीयों की श्रृखंला नहीं होगी बल्कि ये वो यादे है और अनुभव है जिससे मैने 1 महिने 8 दिनों तक महसूस किया। बात ज्यादा पुरानी नहीं 1 जुलाई 2011 से 8 अगस्त 2011 के बीच की हैं। इन दिनों हमारे अंतिम सेमेस्टर की इम्तिहान समाप्त हो चुके थे और सभी की तरह मैं भी नौकरी की तालाश में थी परंतु बात कुछ बनी नहीं मन में उदासी थी और घर से भी आ गई थी। इस बीच मैने स्पंदन में कार्य करना शुरु किया जिसका आँफिस न्यूमार्केट रंगमहल के पास है। मुझे रोज सुबह दस से पहले नीली बस न्यूमार्केट के लिये बस लेनी होती थी। जिसके लिए मैं भागी भागी प्रेस काम्पलेक्स के बस स्टैण्ड पर खड़ी हो जाती थी। जाते वक्त तो इस बस में कभी-कभार हीं बैठने के लिए जगह मिलती थी परंतु ना हीं समय से पहुंचने के ख्याल के अलावा दिमाग में और किसी ख्याल के लिए रत्ती भर जगह होती थी, लेकिन शाम को आते वक्त बस में जगह भी ढेर सारी होती थी और सोचने, समझने देखने के लिए दिमाग और मन में भी ढेर सारी जगह होती थी। इसी बीच सारी बाते तो नहीं परंतु कुछ छोटी-मोटी छितराई सी ऐसी बातें हैं जो मन और दिमाग में एकदम से बैठ गयी जिनका जिक्र मैं इस कहानी श्रृखंला के रुप में करना चाहती हूं।

Monday, July 25, 2011

वृद्धावस्था का सुनहरा अतित

भारतीय संस्कृति के अनुसार वृद्धवस्था को एक सम्मानजनक अवस्था माना जाता था। वृद्ध लोगों का समाज में सम्मान करना हमारी परम्परा का एक अभिन्न अंग माना जाता है। मनुष्य का जीवन चार अवस्थाओँ में बँटा होता है, जिसमें वृद्धावस्था की बारी सबसे अंत में आती है। यह जीवन का ऐसा दौर होता है जब मनुष्य जीवन के तमाम अनुभवों का अऩुभव कर चुका होता है। हमारे देश में वर्षों से संयुक्त परिवार की परम्परा चली आ रही हैं जिसमें घर का सबसे बुजुर्गो व्यक्ति मुखिया की भूमिका में होता है। शादी-विवाह हो या फिर कोई भी पारम्परिक गतिविधी भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के आदेश एवं उनके सुझावों को हीं सर्वोपरि माना जाना तय़ था। बुजुर्गों की आज्ञा का पालन करना ना केवल आवश्यक माना जाता था बल्कि उनके आदेशों को सर्वोपरि भी समझा जाता था। माता-पिता और बुजुर्गों के शब्दों का मान रखना संतान अपना कर्तव्य समझते थे। हमारे देश के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिलते हैं जिसमें हम पाते हैं कि संतानों ने माता-पिता के सम्मान और मर्यादा के लिए अपनी खुशियों का तनिक भी ख्याल ना करते हुए बड़ी से बड़ी कठिनाईयों का सामना हँसते- हँसते कर लिया। मर्यादा पुरुषोतम श्री राम ने पिता के वचनों के पालन मात्र के लिए चौदह वर्षों तक वन में जीवन काटा और अनेक प्रकार की कठिनाईयों का सामना किया, नचिकेता, मुनि मारकण्डेय,श्रवण कुमार ये सभी ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने सिद्ध किया कि हमारें यहाँ बुजुर्गों की क्या महत्वता है। हमारे देश की संस्कृति के अनुसार वृद्धावस्था को किसी बिमारी या अभिशाप की तरह नहीं बल्कि एक उपाधि के समान समझा जाता रहा है। वृद्धावस्था को ऐसा माना जाता है कि इस अवस्था में लोग अपना सारा समय सिर्फ खुद को देते है। जीवन के इस अंतिम चरण में लोग अपना सारा समय सिर्फ ईश्वर भक्ति में बिताते थे, क्योकिं जीवन के इस अंतिम भाग में लोग अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाने के बाद मोक्ष की कामना में ईश्वर में लीन हो जाते थे। बड़े-बड़े राजा महाराजाओं की सिर्फ यहीं कामना होती थी की वृद्धावस्था वे अपना उत्तरदायित्व अपने उत्तराधिकारी कों सौंपकर प्रभु भक्ति में अपना शेष जीवन व्यतित करेंगे। पचास वर्ष की अवस्था के बाद वृद्धावस्था में प्रवेश करने के बाद लोग जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करके अपना सारा समय ईश्वर भक्ति में बिताने के लिए लालायित रहते थे।

हमारी संस्कृति के अनुसार माता-पिता की सेवा करना पुत्रो का धर्म माना जाता था, और बुजुर्गों को ऐसा माना जाता था जैसे बुजुर्ग ज्ञान और अनुभव का खजाना हों घर और परिवार वालों से जुड़े हर एक छोटे-बड़े फैसलें में बुजुर्गों के रजामंदी के बजाय कुछ होना संभव नहीं था। आमतौर पर हमारे यहाँ शुरु से यह परम्परा चली आ रहीं है कि जब पुत्र बड़े हो जाते हैं और घर की जिम्मेदारियों का वहन करने लायक हो जाते है तो घर की अधिकांश जिम्मेदारी उन पर आ जाती है। भलें ही सारी जिम्मेदारी और अधिकार पुत्रों के हाथ में हो परंतु बिना माता-पिता की आज्ञा के बिना कोई कदम उठाना अच्छा नहीं समझा जाता था। सांस्कृतिक और पारम्परिक प्रयोजनों में बुजुर्गों के सलाह के बिना कोई कार्य किया जाना संभव नही था, क्योंकि बुजुर्गों को ऐसा माना जाता था कि उनके हाथों में सारी समस्याओं का हल हो। प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को देखें तो हम पाते हैं कि हमारे यहाँ बुजुर्ग महिलाओँ की स्थिति भी बहुत अच्छी रही है। बुजुर्ग महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा बहुत अच्छी होती थी। जिस घर में कोई बुजुर्ग पुरुष नहीं होता था उस घर में उस घर की बुजुर्ग महिला का पूरा वर्चस्व होता था। घर की बहुएं सारे समय सास की सेवा में लगी रहती थी। राजाओं की मृत्यु हो जाने के पश्चात उनकी रानीयों को राजमाता की उपाधि मिल जाती थी और राज्य से जुड़े किसी भी फैसलें में राजमाताओं की भूमिका अहम होती थी।

वृद्धावस्था को जीवन का सबसे आरामदायक भाग माना जाता था, क्योकिं लोगों के अंदर यह सोच थी कि उन्होनें अपने युवावस्था में अपनी संतानों के भरण-पोषण हेतु जो कष्ट उठायें हैं उसका सार्थक फल उनको वृद्धावस्था में जरुर प्राप्त होगा। नाति-पोतों के साथ खेलना और आनंद के पल बिताने का सपना लोग युवावस्था से हीं देखना शुरु कर देते थे। हमारे देश में वृद्धावस्था को का डरावना भाग नहीं बल्कि आनंददायक पल माना जाता रहा हैं। संयुक्त परिवार की परम्परी होने के चलते घर के सारे बच्चे साथ होते थे, बुजुर्गों से काम कराना समाज में बहुत हीं गलत माना जाता था जिस वजह से वृद्धावस्था में ईश्वर भक्ति के अलावा बुजुर्गों के पास और कोई कार्य नहीं होता था। बुजुर्गों को घर का आधार माना जाता था क्योंकि घर के बच्चों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाना और संस्कार देना बुजुर्गों का काम हीं माना जाता था। बच्चों को तरह-तरह की ज्ञान की बातें बताना उनका मार्गदर्शन करना ये सारे कार्य बुजुर्गों की जिम्मेदारी होती थी।

संयुक्त परिवार में दादा-दादी की भूमिक बहुत महत्वपूर्ण रही है। पुराने समय में बच्चे माता-पिता के सानिध्य से ज्यादा अपना ज्यादातर समय दादा- दादी और नाना-नानी के साथ हीं व्यतीत करते थे। जिससे बच्चों को अपनी संस्कृति और परम्पराओँ का ज्ञान भली प्रकार हो जाता था। बुजुर्गों के सानिध्य से बच्चे भारतीय संस्कृति के मूलों के मूलों को भलि-भांती समझ जान पाते थे। SONAM JHA (BHOPAL)

Saturday, April 16, 2011

गाँव की ओर

शहरी सर्वे कार्यक्रम समाप्त करने के बाद अब बारी आयी गाँव की ओर रवानगी की इसके लिये तीन जिलों का चयन किया गया था जिसमें खरगोन,सागर और विदिशा शामिल किये गये थे। सबसे पहले हमारी टीम खरगोन की ओर रवान हुयी यहाँ पहले दिन मुझे जो गाँव मिला वो था बरुन जो कि खरगोन ब्लाक में आता है। ये गाँव एक मिश्रित आबादी वाला गाँव है जहाँ हिन्दु,मस्लिम और आदीवासी सभी से मिलने और उनके विचारों को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। इस गाँव के ज्यादातर लोग खुद के व्यवसाय से जुड़े हुये थे। जिसमे दर्जी का काम और मुर्गी पालन ज्यादा देखने को मिला। यह गाँव भी कुछ हद तक हिन्दु बाहुल्य हीं था, क्योंकि मुस्लिम घर हिन्दू घरों की तुलना में कम थे। जब यहाँ के लोगों से हमने बात की तो पाया कि भोपाल शहर की तरह यहाँ के लोगों की भी सबसे बड़ी समस्या पानी और बिजली ही थी। साथ ही हमने पाया यह गाँव हमारी कल्पनाओं से बिल्कुल परे एक गन्दे झुग्गी का स्वरुप लिये हुआ था। गंदी बहती नालियां कचड़े भरे सड़क मानो इस गाँव की बदहाली की कहानी सुना रहें हो। परंतु यहाँ रहने वाले लोग इसी में संतुष्ट नजर आये। बहुत कम लोगों ने हीं बात चीत के दौरान साफ-सफाई की बात उठाई इस गाँव मे कुछ घर हरिजनों के थे और कुछ घर उच्च जाति वालों के परंतु एक बड़ा हिस्सा पिछड़े वर्ग का इस गाँव का हिस्सा था। यहाँ के लोगों से बातचीत करते वक्त हमने पाया कि इन लोगों में परस्पर बहुत घनिष्ठता देखने को मिली हिन्दू मुस्लिम एक साथ विचारों के आदान प्रदान में लगे नजर आये,और यहाँ पूरी तरह सभी समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण व्यवहार देखने को मिला जब हमने यहाँ के मुस्लिम परिवार की महिलाओं और पुरुषो से बात की तो पाया कि यहाँ पर रोजगार की समस्या बहुत जटिल है। साथ हीं ज्यादातर मुस्लिम घरों महिलायें किसी गैर पुरुष के सामने भी नही आ सकती। छोटे-छोटे मकानों में एकसाथ 10-12 लोग रहते है और भरी गर्मी में भी इन मुस्लिम महिलाओं को इतनी इजाजत हासिल नहीं है कि वो खुली हवा में सांस ले सकें। यहाँ के ज्यादातर लोग मजदूरी से अपना जीवन यापन करते हैं परंतु मुस्लिम घरों में मजदूरी के लिये सिर्फ पुरुषों को हीं घर से बाहर जाने कि इजाजत है। पूरे सर्वे के दौरान हमने पाया मुस्लिमों की आर्थीक स्थति हिन्दुओं की तुलना में ज्यादा खराब लगी। जिसके पिछे सबसे बड़ी वजह एक लम्बे परिवार का होना नजर आया। विचारों के मामले मे संकुचित लोग अपने जीवन और रहन-सहन से पूरी तरह नाराज नजर आये तथा साथ हीं इन्होने बताया कि सरपंच जी का सारी समय तो खरगोन में ही बितता है उनके पास यदि कोई समस्या लेकर जाना होता है तो पहले हमे खरगोन जाने के लिये किराये का इंतजाम करना होता है।और हमारी स्थति ऐसी नही है कि हम इतने पैसों का इंतजाम कर पायें। इसी बीच जब हमने यहाँ के हिन्दुओं से बातचीत की तो पाया कि इनकी भाषा निमाड़ी है जो कि हिन्दी,गुजराती और मराठी का समन्वय है। व्यवहार के मामले में बड़े हंसमुख ये लोग खुशदिल नजर आये। जीवन का पल-पल का पूरी तरह आन्नद उठाते ये लोग अपनी गरीबी में भी पूरी तरह खुश नजर आये। इस समुदाय के पुरुष और महिलाएं दोनों खेतों में काम करते हैं और कृषि ही इनके आय का साधन है। इस वर्ग के लोगों मे परदा प्रथा देखने को नही मिला साथ हीं ये लोग आत्मविश्वास से लबरेज लगे। परंतु यहाँ की निमाड़ी महिलाएं धर्म के मामले में कुछ कट्टर नजर आयीं इनको मुस्लिमों से कोई परेशानी नही पर वो बहुत ज्यादा पसंद भी नही हैं। ये लोग एक साथ उठते बैठते जरुर है पर एक दूसरे का छुआ हुआ नही खाते क दूसरे के घर का पानी भी नही पीते। परंतु पुरुषों में इतनी कट्टरता देखने को नही मिली। इस गाँव मे कुछ आदीवासी घर थे जो कि आदिवासियों के सबसे ऊंचे वर्ग दरबान से जुड़े थे। इनको देश दुनिया से कुछ लेना देना नही अपने आप और अपने कृषि में पूरी तरह तल्लीन नजर आये। इसके बाद खरगोन जिले में जो दूसरा गाँव था वो था काबरी यह गाँव भगवानपुरा ब्लाक में आता है। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच स्थित ये गाँव सुन्दरता कि मिशाल लगी। छोटे-छोटे कच्चे और आधे पक्के घरों का ये गाँव स्वच्छता और शालीनता से परिपूर्ण लगा। इस गाँव मे ज्यादातर लोग आदीवासी और कुछ लोग हिन्दु थे। कुछ घर ही इस गाँव में मुस्लिमों के थे। इस गाँव में लोगों के बीच पूरा सौहार्द देखने को मिला। यहाँ के लोगों को एकदूसरे से कोई शिकायत नही तथा ये लोग अपने छोटे-छोटे उधोग धंधो में व्यस्त नजर आये। इन सब के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी मिला जिसका कहना था इस गाँव में शांती की वजह ये है कि यहाँ के मुस्लिम हमारे खिलाफ कुछ नही बोल सकते क्योकिं ये एक हिन्दू बाहुल्य गाँव है। वरना इस जाति के लोगों का विश्वास नही होता। इसके बाद हमने खरगोन से यहाँ कि यादों को समेटे हुये विदा ले लिया। इसके बाद बारी आयी सागर की यहाँ पहुंचकर पहले दिन मुझे जिस गाँव जाने को मिला वो था सेमरा जो कि केसली ब्लाक में स्थित है। एक लम्बे कच्चे सड़क के बाद हमें यह गाँव मिला। यहाँ के लोगों के पास भी खेती और खेतिहर मजदूरी के अलावा कोई काम नही है। यहाँ के युवाओ का ज्यादातर वक्त बैठकबाजी में हीं बीता करता है। इस गाँव में कुछ लोगों ने तो बड़ा सहयोगात्म रवैया अपनाया परंतु ज्यादातर लोग बड़े अनमने भाव से पेश आये। सेमरा गाँव एक ऐसा गाँव है जहाँ ज्यादातर लोग पिछड़े वर्ग के हैं। तथा कुछ घर हरिजनों के है इस गांव में ना तो एक भी घर मुस्लिम का है और ना ही उच्च जाति का। साथ हीं यहां के महिलाओं और पुरुषों का सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान का स्तर बड़ा कमजोर नजर आया। साथ हीं एक बात जो मैने महसूक की यहां की महिलाएं बड़ी दबी और संकुचित नजर आयी घर में हर एक छोटे बड़े निर्णय पुरुषों के द्वारा हीं लिये जाते है। ये महिलायें अपने आप को किसी योग्य नही मानती। इस पिछड़े वर्ग के बाहुल्य वाले गांव मे हमने पाया यहाँ कि हरिजन महिलाएं पिछड़े वर्ग की महिलाओं से ज्यादा सशक्त तथा जागरुप नजर आयीं। यहां से हमें जानकारी प्राप्त हुयी की इस गाँव में हरिजन लोग पिछड़े वर्ग के साथ बराबरी में नहीं बैठ सकते और न हीं उनके नलों से अपने हाथ से पानी ले सकते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों और उत्सवों में भी इनको दूर रखा जाता है। इस गाँव में काम खत्म करने के बाग अगले दिन बारी आयी सागर जिले के पिपरिया चौदह गाँव कि जो कि बंदा ब्लाक में स्थित है। इस गाँव में भी एक बड़ा तबका पिछड़े वर्ग का हीं था तथा साथ में एक हरिजन बस्ती थी जहाँ हरिजनों की एक अलग दुनिया थी। इस गाँव में मात्र पाँच घर हीं उच्च जाति वालों के थे। यहाँ के पिछड़े वर्ग के लोग उच्च जाति के लोगों को बड़ा मान देते हैं तथा उनके साथ उठना बैठना पसंद करते हैं परंतु निचली जाति को बराबरी में बैठने की इजाजत भी नही देते तथा उनके हाथ का पानी भी नही पीते। यहाँ के उच्च् जाति के लोग भी पिछड़े वर्ग से बड़े घुले मिले नजर आये शायद इसकी वजह पिछड़े वर्ग की बाहुल्यता थी। परंतु व्यवहार के मामले में ये उच्च जाति के लोग बड़े टेढ़े नजर आये। जब हमने इस गाँव की हरिजन बस्ती में प्रवेश किया तो पाया कि मानो गाँव का सबसे शालीन हिस्सा यही है। यहाँ से हमें ज्ञात हुआ कि यहाँ पर छूआ-छुत अपने चरम पर है किसी भी सामाजिक उत्सव मे उच्च वर्ग और पिछड़े वर्ग के लोग साथ रहते हैं जबकि हरिजनों को इससे दूर रखा जाता है। इस गाँव के लोग मुस्लिमों को लेकर बड़े कट्टर नजर आये उनका कहना था कि हम तो उनके मजार पर माथा टेकने चले जाते है पर वो कभी भूल से भी हमारे मंदिरो की सीढियां नही चढ़ते ऐसे लोगों से क्या मित्रता ये तो किनारे ही रहें तो हीं हमारी भलाई है। इसी के साथ मेरी ग्रामीण ईलोको का सर्वे कार्यक्रम समाप्त हुआ। जहाँ मैने पाया ग्रामीणों को जितना पिछड़ा समझते हैं वो इसकी तुलना में कई गुना ज्यादा समझादार नजर आये। गाँव में रहने वाले शिक्षा के महत्व को पूरी तरह समझते है परंतु उनके इस समझ के बीच की सबसे बड़ी रुकावट उनकी गरीबी है।

Problems of women

In the 21st century where we find everything in a settled way, proudly boost of being the part of globalization and modernization we have many things unlooked. As every coin has two sides so has the India’s profile. One the one hand where we can see rich life style of people there are a large number of people in the same India who struggle for their a day’s meal. I keep asking this question again and again to myself but cannot draw any inference. I think I can solve the problem once I get into the system in a proper way. Recently a research programme was conducted by the Upssala University, Sweden, and I got the opportunity to be the part of it kudos to Samarthan. As I am keenly interested in women oriented issues and gender inequality so I observed everything very minutely. While in field I gained a lot of practical knowledge related to women living in the slum areas. I was shocked to hear that domestic violence, food insecurity, problems of sanitation, eve teasing are not a very serious problem for them. In fact while talking to one of the women, I was stunned when she said ‘these are part and parcel of women life. We are nothing in the absence of male guardian’. It was shocking to know that even in the 21st century we have women with such perspectives. The women living in slum areas are mostly exploited by their husband but the women are not ready to leave them or take any action against them. Women have been suppressed and kept under control by men for ages and this process continues. Despite calling women an integral part of family they have no importance. When we talk about the education and awareness of women in rural and slum areas we get to know that they are still uneducated and unaware of the present scenario to a great extent. The girls in these areas are not given formal education instead are told about the know-how of household chores. Poverty plays a crucial role in the development and education of girls. According to the people living in slums and rural areas ‘ we cannot afford education to all of our children especially to the girl child. So we prefer to provide qualification to our boys’. The concept lie behind this is that they still think that the boys are their own property while the girls have to go to someone else’s family. So why to spend money on those who is someone else’s property. Also early marriage has a lot of adverse effects on the health of women. Girls getting married in their teenage get various psychological problems. They get pregnant early which leads to bad impact on their health. 60% of girls in the rural and slum areas get married before they are 18. They are not even aware of medical treatment related to pregnancy. .

भोपाल से जुड़े अनुभव

बहुत दिनों से मन में इच्छा थी कि भोपाल शहर को जान पाऊं क्योंकि हमलोग जिस ईलाके में रहते हैं यहाँ पर भोपाल शहर अपनी संस्कृति से दूर आधुनिकता की गोद में समया हुआ है। ये जगह ए.पी.नगर के नाम से जाना जाता है। यहाँ आने से पूर्व जो भोपाल के बारे में मेरी जो परिकल्पनायें थीं वो लगभग उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर जैसी हीं थी कि यहाँ भी महौल नवाबी अंदाज जैसा ही होगा, परंतु यहाँ पढ़ाई और सेमिनार के बीच कभी ऐसा अवसर ही नहीं मिला की भोपाल के वास्तविक स्वरुप को जान पाऊं यहाँ कि गलियों को पहचान पाऊं। इसी बीच जब मैनें अपने थर्ड सेमेस्टर की परीक्षा खत्म की यानि की भोपाल में अब बस गिने चुने महिनें हीं मेरे लिये बच गये इसी बीच समर्थन नामक शहर के प्रतिष्ठित एन.जी.ओ के कार्यकर्ता चंचल मोदी के द्वारा हमें एक ऐसा अवसर प्राप्त हुआ जिससे हम इस शहर के विभिन्न वार्डो में घूम सकें और भोपाल की मौलिकता को पहचान सकें। हम सारे दोस्त लगभग एक हीं थाली के चट्टे-बट्टे हैं और क्या चाहिये था हमें हम झट तैयार हो गये। चंचल सर ने हमें बताया की 23 फरवरी को हमारा ओरिएन्टेशन होगा जिससे हमें इस सर्वे कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की गयी, दरअसल इस सर्वे कार्यक्रम का आयोजन स्वीडन की उप्पसल्ला विश्वविधालय की ओर से किया गया था जिसको भोपाल में सुचारु रुप से संचालित करने के जिम्मेदारी समर्थन के उपर थी। 25 फरवरी 2011 से शुरु हुआ ये सर्वे जिसका लक्ष्य था यहाँ रहने वाले लोगों के सहिष्णुता को परखना । ये सर्वे हमारे लिये बड़े हीं रोचक अनुभवो वाला रहा। मेरा पहला दिन श्री राम काँलोनी में बीता ये एक ऐसी काँलोनी है जहाँ शहर के उच्च-मध्यमवर्गीय लोगों का हीं बसेरा नजर आया और कुछ ज्यादा वालों का ठौर। यहाँ हमने पाया महानगरों की तरह एक घर में रहने वाले लोगों को ये भी नही की पता था कि उनके एकदम पड़ोस में कौन रहता है? सफाई के मामले मे चकाचक यह ईलाका अपने आप में ही मशगूल नजर आया। यहाँ रहने वाले लोगों से हमें यह मालूम हुआ की वे भारतीय अखण्डता में विश्वास करते हैं उनके लिये इंसानियत सर्वोपरी है। पर एकाध लोग ऐसे भी मिले जिनका कहना था कि मुस्लिमों को तो देश से निकाल हीं देना चाहिये या फिर उनके अधिकारों को एकदम संकुचित कर देना चाहिये क्योंकि साहब सारी फसाद की जड़ यही हैं। दूसरे दिन एक ऐसे मोहल्ले में बिता जो दो भागों में विभाजित था एक पूरे भाग में मुस्लिमों का डेरा-बसेरा और दूसरे भाग में हिन्दुओं का परंतु यहाँ रहने वाले ज्यादातर हिन्दू पिछड़े वर्ग और हरिजन समूह के थे। यहाँ रहने वाली मुस्लिम औरतों का कहना था कि हिन्दुओं से हमें कोई बैर शिकायत नही वो तो हमारे हीं भाई है, परंतु हिन्दू लड़कियों की सौबत में हमारी बेटियां भी ज्यादा आधुनिक हुये जा रही हैं जिससे ज्यादा परदा करने को कहने पर हमारी लड़किया हमें हिन्दू लड़कियों के उदाहरण देने लगती हैं। परंतु यहाँ रहने वाली झुग्गियों की औरते कई मौके पर अच्छे पक्के मकान में रहने वाली औरतों से ज्यादा सशक्त और जानकार नजर आयीं। इसके बाद हमारा सफर बाल्मीकि नगर और कुम्हारपुरा में रहा यह ईलाका महाराणी लक्ष्मीबाई वार्ड में आता है यहाँ भी बाल्मीकि नगर एक झुग्गियों वाला ईलाका है जहाँ ज्यादातर लोग हरिजन है और कुछ परिवार पिछड़े वर्ग के है। परंतु यहां की झुग्गियों में रहने वाले लोग बड़े हीं व्यवहार कुशल और सामाजिक तौर पर जानकार नजर आये। यहाँ के एक घर की महिला किरण लोट ने तो मेरे मन में एक खास जगह बना लिया। महज आठवीं पास यह महिला अपने व्यवहार और कुशल वाणी के माध्यम से अच्छे-अच्छो को मात देने में समर्थ नजर आयीं। परंतु यहाँ रहने वाले कुछ घरो में मुस्लिमों को लेकर एक अलगाव सा नजर आया खासकर महिलाओं के अंदर ये भाव ज्यादा दिखे जिसका कारण उन्होनें बताया कि उनको मुस्लिमों का रहन-सहन बिल्कुल नही पसंद। मुस्लिम रोज नहाते नही और बड़े गंदे तरिके से रहते हैं ऐसी आदत हमारे बच्चे हमारे बच्चे सिखेंगे तो वो भी गंदे हो जायेंगे इसके बाद बारी आयी निशातपुरा के कृष्णा काँलोनी की इस काँलोनी का नाम जानने के बाद हमे लगा कि ये कोई हिन्दू बाहुल्य ईलाका होगा पर यहाँ जाने के बाद हमे पता चला यह एक मुस्लिम बाहुल्य ईलाका है जहां केवल दो घर ही हिन्दुओं के मिले। इस ईलाके में हमने पाया लोगों का बर्ताव सामान्य नजर नही आया और बहुत कोशिशों के बावजूद वो हमारे साथ अनमने भाव से पेश आये। ये अनुभव अब तक का सबसे अलग अनुभव रहा। परंतु इसके बाद एक ऐसा ईलाका हमारे हिस्से में आया जो भोपाल के उन यादों को ताजा करता है जिसने लगभग भोपाल का विनाश ही कर डाला था यानि भोपाल गैस त्रासदी से क्षतिग्रस्त हुआ ईलाका आयूब नगर यह एक झुग्गी के रुप मे जाना जाता है। चूकि यहाँ पर रहने वाले लोंगो के पास कोई स्थाई रोजगार नही है तो उनका ज्यादा समय बैठक बाजी में ही बीता करता है। यह ईलाका हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित आबादी वाला ईलाका है। यहाँ भी द्वन्द साफ सफाई का ज्यादा नजर आया यहाँ भी ज्यादातर लोगों ने सामाजिक और राष्ट्रीय एकता पर बल दिया परंतु कुछ लोगों ने मुस्लिमों से होने वाली समस्याएं जैसे उनके रहन-सहन के तरिके उनके धार्मिक कट्टरता पर व्यंगात्मक रवैया अपनाया। इस सर्वे के दौरान हमने पाया ज्यादातर लोग भारत की राजनीतिक व्यवस्था से तो संतुष्ट है पर अपने राजनेताओं से उनको ढेरो शिकायतें हैं। कुछ तो इसका मतलब हीं नही समझते सरकार मतलब उनके पसंद के उस आदमी की होनी चाहिये जिस पार्टी को उनके परिवार वाले बरसों से वोट देते आ रहे है। इससे कुछ सरोकार नही की वो आदमी वोट के काबिल है भी या ऩही। इस सारे सर्वे के दौरान मैनें समपन्नता और विपन्नता की ऐसी खाई देखी जिसको पाटना बड़ा जटिल नजर आया। एक ऐसा वर्ग जिसके पास खाली समय में सोचने के अलावा और कुछ काम नही है,और एक ऐसा वर्ग जिसके पास काम के अलावा और कुछ के लिये समय हीं नही बच पाता फिर भी दो समय के खाने का पूरा जुगार नही हो पाता। इस सब के अलावा मैं जहाँ भी गयी पुरुष वर्ग ज्यादा जागरुप नजर आया महज एकाध स्त्रियों को छोड़कर मैनें पाया जीवन के 40-50 से भी ज्यादा साल बिता देने के बाद भी ज्यादातर स्त्रियां एक छोटा सा फैसला लेने कि लिये भी घर के पुरुषों पर निर्भर रहती हैं। वहीं मैनें पाया चमकता हुआ भोपाल सभी के आँखो को रोशन करता है वहीं इस भोपाल के इन निम्न ईलाकों में रहने वाले लोग पानी की कमी,गंदगी और असुरक्षा के बीच जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि इसके अलावा इनके पास और कोई चारा नहीं है। सरकार के द्बारा चलाये गये सुधार कार्यक्रम कागज पर तो बड़ी तेज गति से चल रहे है परंतु शायद इन गलियों के अंधेरेपन के कारण ये यहाँ सुचारु तौर पर लागू नही हो पा रहें हैं।