बहुत दिनों से एक कहानीयों की श्रृखंला शुरु करना चाह रही थी परंतु कार्य की व्यस्तता के चलते समय नहीं निकाल पायी परंतु आज जनसत्ता के एक लेख ने मुझे इस कदर उद्वेलित कर दिया कि मुझे लगा जो भी हो समय निकाल कर अगर प्रतिदिन सम्भव नहीं हो पाया तो कभी-कभार हीं सही अपने विचारों को अपने ब्लाग पर जरुर बिखेरुंगी जिससे कभी फुरसत में खुद के विचारों को पढ़कर कर समझ कर अपने राय विचार का आकलन कर पाउं अअनुभव के मुताबिक मैने महसूस किया कि कार्य की व्यस्तता के दौरान हीं हमारे दिमाग में कितने संवेदनशील और महत्वपूर्ण बाते, विचार और कुछ यादें कौंध जाती है जो कि जितनी तिब्रता से कौंधती हैं उतनी हीं तिब्रता से हमारे दिमाग से फिसल भी जाती हैं। शायद ये विचार ये परखने की कोशिश करते हैं की हमको इनकी कदर हैं कि नही जिनकों इनकी कदर होती है वे अपने हर एक विचार और अनुभवों को कलमबद्ध करते चले जातें हैं जिसके कई उदाहरण हमारे महान लेखकों की श्रृखंला है।
खैर इन बातों के पहले मैनें जिस कहानी श्रृखंला की चर्चा की थी उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए बताना चाहूंगी कि ये कोई मेरे मन से गढ़ी हुयी कहानीयों की श्रृखंला नहीं होगी बल्कि ये वो यादे है और अनुभव है जिससे मैने 1 महिने 8 दिनों तक महसूस किया। बात ज्यादा पुरानी नहीं 1 जुलाई 2011 से 8 अगस्त 2011 के बीच की हैं। इन दिनों हमारे अंतिम सेमेस्टर की इम्तिहान समाप्त हो चुके थे और सभी की तरह मैं भी नौकरी की तालाश में थी परंतु बात कुछ बनी नहीं मन में उदासी थी और घर से भी आ गई थी। इस बीच मैने स्पंदन में कार्य करना शुरु किया जिसका आँफिस न्यूमार्केट रंगमहल के पास है। मुझे रोज सुबह दस से पहले नीली बस न्यूमार्केट के लिये बस लेनी होती थी। जिसके लिए मैं भागी भागी प्रेस काम्पलेक्स के बस स्टैण्ड पर खड़ी हो जाती थी। जाते वक्त तो इस बस में कभी-कभार हीं बैठने के लिए जगह मिलती थी परंतु ना हीं समय से पहुंचने के ख्याल के अलावा दिमाग में और किसी ख्याल के लिए रत्ती भर जगह होती थी, लेकिन शाम को आते वक्त बस में जगह भी ढेर सारी होती थी और सोचने, समझने देखने के लिए दिमाग और मन में भी ढेर सारी जगह होती थी। इसी बीच सारी बाते तो नहीं परंतु कुछ छोटी-मोटी छितराई सी ऐसी बातें हैं जो मन और दिमाग में एकदम से बैठ गयी जिनका जिक्र मैं इस कहानी श्रृखंला के रुप में करना चाहती हूं।
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