Friday, August 14, 2015
बागड़- बिल्ला
बागड़- बिल्ला
वो चुप रहने लगी है..
माने, बस काम भर का बोलने लगी है..
बरतन, बासन, कपड़ा लत्ता सब करने लगी है...
वो जो पहले दिन भर चिल्लाती थी...
पूरे घर में बेवजह चें चें मचाती थी...
वो जो अपने कपड़ों और अन्त: कपड़ों को भी ना हाथ लगाती थी..
माँ की गाली खाती थी फिर भी बेवजह ईतराती थी....
जो पूरे खानदान की बागड़- बिल्ला कहलाती थी...
वो बिल्ला अब चुप रहने लगी है...
तमाम दर्द उसने सिल-बटटे पर पीसकर..
फिर घोलकर पी लिया है....
वो छटपटाती है औकाती है...
फिर भी वो चुप रहने लगी है..
बागड़- बिल्ला क्यों खामोश हो गयी है...
Saturday, August 8, 2015
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