छोटे शहर वाला मन
इस भागम-भाग वाली जिन्दगी
में अपने आस-पास भी कुछ देख पाना कहाँ आसान होता है,
इस जटिल प्रतियोगिता वाले दौर में जहाँ हर कदम पर एक नई जंग टाइप का सीन होता है, जिस
में हर मिनट का हिसाब होता है, जिस हड़बड़ी को बहुत ही ख़ूबसूरती से टाइम इज करेंसी
कह देते हैं . खैर इन सब के बीच जब तेज
रफ़्तार में चलती हुई, आत्मविश्वास से लबरेज लड़कियों को मेट्रो शहर की रफ़्तार के
साथ कदमताल करते देखती हूँ तो लगता है तमाम
अनिश्चिताओं के बीच कुछ तो गुलमोहर सा है, इस मेट्रो शहर तक पहुँच पाने की राह में आई तमाम कठिनाइयों, जटिलताओं और कईयों की संदेह से
भरी आँखों के प्रभाव को तोड़ यहाँ तक पहुँच पाना अपने सपनों की पगडंडियों पर लड़खड़ाते-सँभालते हुए
चल पाना आसान नही होता होगा किसी भी पूजा,सुजाता
और श्वेता के लिए...पर कई बार देखती हूँ, लड़कियों को फोन पर किसी को मनाते हुए, कॉल क्यों नही कर पाई, बिजी
थी, सफाईयां देते हुए, रोते हुए, सिसकते हुए, ....तो मन करता है... उनका हाथ पकड़
कर पूंछू...क्यां इन्ही दलीलों को पेश करने आई थी...ये आम है आज-कल ये टॉक्सिक
रिलेशनशिप कई बार सुसाइड जैसे खतरनाक मोड़ पर पंहुचा देते है, डर लगता है किसी को इस तरह बिलखते हुए देखकर,
पर कभी हिम्मत नही हुई की किसी को चुप करा
सकूं,... बहुत पर्सनल और इंडिविजुअलिस्टिक होता है, मेट्रो शहर का स्ट्रक्चर...पूरा
का पूरा मशीनी...गिव एंड टेक के फार्मूला पर आधारित इस शहर में भीड़ तो बहुत है, पर
इस भीड़ में हर कोई पूरी तरह अकेला, इस बड़े शहर में कभी -कभी घबरा जाता है, मेरा ये
छोटे शहर वाला मन.
#lifeinmetro