Thursday, August 17, 2023

 Those good days when every day we used to have a good discussion on healthy issues—reading newspapers—and discussion on my recent reading was part of our daily routine. But my destiny suffers from the separation from those people; they are the cause of my smile. It was also my mistake that I spared my thoughts for those people and the kinds of things that shouldn't be in my mental and emotional sphere. But realisation is a good thing. I forgot that I did not imagine a life full of crispy, crunchy domestic-diplomatic diets full of toxic effects. So trying to remind myself all the time that the world is so beautiful with beautiful authors, books, and music... I am a person who chooses people based on their literary interests. All my good friends are in my life, and I have the same literary choice with them up to some extent. Do you remember "Maya"? In our first year of Mphil course work, we both had the same opinion about each other: "Ye ladki ghamandi hia," and once, when we discussed Jhumpa Lahiri's Low Land, we became close friends. With a book that saved me from the toxic ideological clutch of campus life, How could I undermine all these good approaches to my life in front of such issues? .. abosoluetyl It's my fault, but it's also true that, as human beings, we cannot save ourselves from the effects of our surroundings. So all right, things will be transformed. I hope so. Remembering my old days when writing was the part of my life every day I used to write... Once I was so upset and distracted at that time, I read "Kurtualain Haider's Book," and again, I came on track. I didn’t wish for the glamourous kind of life... and even I am not confident with the show-off things... I love to move in the local market, observing the facial expressions of people engrossed in their work. and how they spared time for real amusement among all the chaos. I love this way of life, where life cannot be based on only amusement. I love the way people do their work and then they spare a moment for chersis..how women used to sell vegetables and manage their children... How an old lady sits with gratitude on her face and uses to sell a few things like vegetables, local fruit, or anything.

Sunday, April 17, 2022

छोटे शहर वाला मन

छोटे शहर वाला मन

इस भागम-भाग वाली जिन्दगी में अपने आस-पास भी कुछ देख पाना कहाँ आसान होता है, इस जटिल प्रतियोगिता वाले दौर में जहाँ हर कदम पर एक नई जंग टाइप का सीन होता है, जिस में हर मिनट का हिसाब होता है, जिस हड़बड़ी को बहुत ही ख़ूबसूरती से टाइम इज करेंसी कह देते हैं . खैर इन सब के  बीच जब तेज रफ़्तार में चलती हुई, आत्मविश्वास से लबरेज लड़कियों को मेट्रो शहर की रफ़्तार के साथ कदमताल करते  देखती हूँ तो लगता है तमाम अनिश्चिताओं के बीच कुछ तो गुलमोहर सा है, इस मेट्रो शहर तक पहुँच पाने  की राह में आई  तमाम कठिनाइयों, जटिलताओं और कईयों की संदेह से भरी आँखों के प्रभाव को तोड़ यहाँ तक पहुँच पाना  अपने सपनों की पगडंडियों पर लड़खड़ाते-सँभालते हुए चल पाना आसान नही होता होगा किसी भी  पूजा,सुजाता और श्वेता के लिए...पर कई बार देखती हूँ, लड़कियों को फोन पर  किसी को मनाते हुए, कॉल क्यों नही कर पाई, बिजी थी, सफाईयां देते हुए, रोते हुए, सिसकते हुए, ....तो मन करता है... उनका हाथ पकड़ कर पूंछू...क्यां इन्ही दलीलों को पेश करने आई थी...ये आम है आज-कल ये टॉक्सिक रिलेशनशिप कई बार सुसाइड जैसे खतरनाक मोड़ पर पंहुचा देते  है, डर लगता है किसी को इस तरह बिलखते हुए देखकर, पर कभी हिम्मत नही हुई की  किसी को चुप करा सकूं,... बहुत पर्सनल और इंडिविजुअलिस्टिक होता है, मेट्रो शहर का स्ट्रक्चर...पूरा का पूरा मशीनी...गिव एंड टेक के फार्मूला पर आधारित इस शहर में भीड़ तो बहुत है, पर इस भीड़ में हर कोई पूरी तरह अकेला, इस बड़े शहर में कभी -कभी घबरा जाता है, मेरा ये छोटे शहर वाला मन.

#lifeinmetro


Monday, February 28, 2022

इंसानिया की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए किताबों वाले दिनों का होना बहुत जरूरी है.....

 

ये समय ऐसा चल रहा है, जब हमारे ये नई-पीढ़ी के नौजवान कुछ सीखने से ज्यादा जताने को महत्व देते हैं, आरोप प्रत्यारोप इनके जीवन का हिस्सा हो गया है, ...ये प्रवृति जो युवाओं में विकसित हो रही है, जिसमे किसी विषय की गंभीरता को समझे बिना ...सिर्फ अपनी सतही समझदारी के स्तर पर फैसला सुना देना...ये बहुत गंभीर विषय और भयावह मुद्दा  है... डिजिटल जोक्स और रील के जमाने में संवेदनाए, और मानवीय मूल्य के विषय इन्हे मज़ाक लगते हैं, नॉलेज के मायने इनके लिए टेक्निकल ही हैं, साहित्य बोरिंग और यूसलेस है, सामाजिक सरोकार के मुद्दे इन्हे बकवास लगते हैं….ये सारे तथ्य किसी भी देश के सतत विकास के लिए बहुत भयावह है.... सारे रेसौर्सेस, में ह्यूमन रेसौर्स जैसा महत्वपूर्ण कुछ नही है....तमाम, इमराते, विज्ञान और मूर्तिया व्यर्थ हो जाएंगी यदि हम अपने युवाओं और बच्चों को शिक्षा के सही मायने समय रहते नही सीखा पाएंगे तो सब कुछ धरा का धारा  रह जाएगा ....ये संवेदनाओं और समूहिक सरोकार की कमी ही है कि आय दिन आत्म-हत्या जैसी घटनाएं हमें सुनाई देती हैं....इनसे बचने के लिए हमें सीखना होगा अपने बच्चों को सिखाना होगा, अपने नौ-जवानों से बात करनी होगी और किताबों वाले दिनों का आगाज़ करना होगा...जहाँ उपन्यास और कहानिया सिर्फ कोर्स-वर्क के अलावा हमारे हर दिन का हिस्सा हो....इंसानिया की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए किताबों वाले दिनों का होना बहुत जरूरी है.....

Thursday, June 17, 2021

Women's Diary

 

Sometimes we feel lonely, disappointed and absolutely lost.. but these can be painful and suppressing for me but for the society from where I belongs feelings of women do not have any value…she is made for only being framed in the frame of expectations…she is allowed for expansion of her dreams but it must be associated with the compound of responsibility and be nourished with the mild notion of patriarchy…Being women is a lot.. which cannot expressed appropriately…it’s a harsh feelings wrapped with glittering wrapper of imposed fragile feelings by others named…innocence, fragile, obedient, be responsible for all the responsibilities …which can be easily denied by men… being educated and uneducated doesn’t mean the level of pain would be less or more…its more about how you value to your own value…if  you are blessed with ignorance  of being equal level of human in such case the story is different and  being in pain you think it’s your fate….but if you consider that you are also an individual having with heart and mind …in such concerns every step of your life is going to be tough and tough…..the way of life you acquired after long learning can be cause of humiliation for the notion of patriarchy …being women and witty its absolutely unaccepted…being women and be happy with own company can occurred  hindrance in the calm sleeping nights of so many….so being a women and maintaining  individuality  and preservation of own identity is going to be one of the toughest job in our sanskari society.

 

Monday, March 20, 2017

एहसास –ए-गौरैया

एहसास –ए-गौरैया
हम छोटी छोटी तमाम चीजो से मिलकर बने है एहसास ,प्यार , लगाव , यादें , रिश्ते, दोस्त और भी बहुत कुछ,  इन सब के बिना हमारे जीवन का कोइ मतलब नही है . हमारी जिन्दगी में हमारे बचपन की  सबसे अहम भूमिका होती  है  और इस बचपने को गौरैया ,तितली, सुग्गा (तोता ) हेलीकाप्टर वाली तितली, ये सब मिलकर  इसको पूरा करते हैं. हम कितने जिज्ञासु हुआ करते थे अपने बचपन में हर चीज के बारे में जानने को लेकर उतावले हर दूसरे पल हमारे पास एक सवाल हुआ करता था, और कौतहल से भरी आँखे, कुछ भी नया हमे उत्साह से भर दिया करता था.
गौरैया जिसकी टिमिर-टिमिर गोल गोल आँखे हमारी गलतियों की वजह से बहुत उदास हो गईं हैं  , गौरैया जो हमारे घर आंगन में फुदकती रहती थी, दादी, बड़की माँ और माँ जो कुछ भी पछोड़ कर किनारे में इक्कठा कर देती थी गौरैया हमेशा उसी से गुजारा कर लिया करती थी, उसने उपर से कभी कुछ नही माँगा. गौरैया हमेशा जॉइंट फॅमिली में रही है इसलिए उसका इस सिंगल यूनिट फॅमिली में मन नही लगता.
माँ बचपन में हम लोगो को एक किस्सा सुनाती थी ,जिसमे आंजुल नाम की एक लड़की को उसकी भाभीया बहुत तंग करती थी और हमेशा कुछ ना कुछ मुश्किल काम में फंसा दिया करती थी. एक दिन आंजुल को एक पथिया ( बांस का बना बड़ा टोकरा ) धान पकड़ा दिया गया और बोला गया कि अगर आंजुल शाम तक सारे धान में से एक एक करके बिना टूटे चावल नही निकाल लेगी तो उसे खान पीना नही दिया जायेगा, आंजुल परेशान होकर रोने लगी उसको रोता हुआ देखकर गाछ से फुदककर एक गौरैया उसके पास आई और पूछा क्या हुआ? जब उसने आंजुल की समस्या जानी तो उसने तुरंत गौरैया कमेटी की मीटींग बुलाई और सबने मिलकर तय किया की आज कोइ भी दान चुनने नही जायेगा और सब लोग मिलकर आंजुल की मदद करेंगे और सबने मिलकर शाम तक आंजुल के सारे धान से चावल निकाल कर उसकी समस्या का समाधान कर दिया. और आंजुल खुशी –खुशी अपने घर चली गई और उन सारी गौरैया से उसकी खूब अच्छी वाली दोस्ती हो गई.
ये सिर्फ एक कहानी नही ऐसी तमाम कहानिया हमारे बचपन को कल्पना का आधार देते है, जिससे ये सब पेड़ पौधे पशु –पक्षी हमें अपने लगते हैं. पर चिजे बहुत तेजी से पर बदल रही है प्राइवेसी की चाहत हमे दिनों दिन अकेला करती जा रही है . हम माचिस के डिब्बे जैसे घरो की चाहत में सालो साल क़िस्त भरते है और इन किस्तों की मार में हम अपनी जगह –जमीन , गाछी, टोल –मोहल्ला, रिश्ते , नाते सबसे इतने दूर हो गये हैं कि  की बस फेसबुक और व्हाटस तक सिमटे हुए वास्तविक्त से आभास की दुनिया के होकर रह गये हैं. लोग अपने बच्चो को अपनी बोली नही सिखाते उन्हें सख्त हिदायत होती है वो सिर्फ अंगेजी के शब्दों का प्रयोग करेंगे, उन्हे दादी , नानी के किस्सों के बारे में कुछ नही पता उन्हें तो इंटरनेट पर फेरी टेल देखने की आदत दिलाई जाती है . हम अपने बच्चो को उनके बचपने से दिनों दिन दूर करते जा रहे है, हम लगातार एक ऐसी आभासी दुनिया के निर्माण में लगे है जहाँ अवसाद हीं अवसाद है. गर्दन टेढ़ी कर के महज अंगरेजी में बात करन हीं जीवन नही है ,जीवन बिना संवेदनाओ के ऐसा है जैसे कोमा में इंसान. हम अपने आप से दूर होते जा रहे है दिखावे की दुनिया ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है हमारे पकवान की जगह पिजा लेता जा रहा है और हमारे गीतों को कान चिनका देने वाली संस्कृती निगलती जा रही है. तकनीक हर जरूरत  का विकल्प तो नही हो सकता . बदलवा और विकास के नाम पे हम खुद को छलते जा रहे हैं हम दिखावे की संगत में खुद नई जरूरत तैयार करते है फिर उस जरूरत के लिए रोबट की तरह खटने में जुट जाते हैं .
इन सब में हम बहुत कुछ खोते जा रहे है. हमने अपनी गौरैया को भी लग्गभग खो दिया है झरोखो में एग्जाज फैन लग गये हैं और खिडकियों पर ए.सी को बिठा दिया गया है तो ऐसे में कैसे आयेगी हमारी गौरैया हमारे पास  , गौरैय तो कुतरा मुतरा अनाज खाती है उसे पिज्ज्जा खाने नही आता फिर कैसे रहेगी हमारी गौरैया हमारे पास . हम एक हीं शहर में गजते जा रहे है ..विकल्पों की कमी तो हैं हीं रोजगार नही है पर इस धक्कम-धुक्क्म की रवायत जो शुरू हुई है इसमें हमने विकल्प के बारे में सोचन भी तो छोड़ दिया है ..हर कोई इन्जीनीर बनना चाहता है अपने बच्चो को बहुत कम है जिनकी ख्वहिश हो की उनके बच्चे अध्यापक बने और समाज में शिक्षा और जागरूकता को लेकर पहल करे, पर ऐसा तो शायद हीं कोइ होगा जो अपने बच्चे को किसान और माली बनाना चाहता हो की उसका बच्चा खूब सारा आनाज पैदा करे और खुब सारे फल और फूल लगाये की गौरैया, तितली और कोयल, मैना , सुग्गा सब खूब खुश हो जाये और सब मिलकर नाचे गाये. हम अपनी जमीन के प्रति जड़ होते जा रहे हैं . आधुनिकता जरूरी है पर सिर्फ आधुनिकता से कैसे चलेगा काम कि हम क्या प्लास्टिक की रोटी खाना शुरू कर देंगे?


Friday, February 10, 2017

कसमसाहट

एक पल को कभी ऐसा ख्याल हीं नही आता की जिन्दगी एक दम आसन होगी आगे की सोचो तो लगता है पल पल निकल रहा है ..तेजी से बहुत तेजी से सब कुछ दिनों दिन जटिल से जटिल हो रहा है ..शिक्षा , रोजगार , आहार , पानी सब कुछ बिकने लगा ..सहजता से दूर हम सब एक जाल में फंसते जा रहे हैं ..सहूलियत की एक एक आदत इस जाल को और मजबूत करती जा रही है ..हम अपने आप को दिन ब दिन मशीन बनाते जा रहे हैं ..इन सुविधाओ की एवज में हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं ..अपनों की जगह मशीनों ने ले लिया है ..सब कुछ है बस मन का चैन नही ..असुर्खा की भावना बढती हीं जा रही है ...डर की सतह पर हम फिसलते जा रहे हैं ..और हम छटपटा रहे हैं ..अपनी जगह पर और हमारे पैर फसे हुए हैं ...हम नही निकल सकते इन सब से ..

Monday, January 16, 2017

बाबू जी

..बाबू जी हर वक्त उदास से रहते हैं ..उनका मन खिन्न रहता है ..बड़ी बेटी की शादी में मात खाने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि अब अपन दोनों बेटियों को तब तक नही ब्याहेंगे जब तक दोनों अपने पैर पर ना खड़ी हो जाये ..माने दुनिया को जानने समझने ना लगे ..सब कुछ ऐसा हीं तो हो रहा था ..दोनों बेटियां देश के दो बड़े –बड़े संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल कर रही थी ..बड़ी बेटी ने भी जैसे तैसे खुद को दुनिय से लड़ने के लिए तैयार कर लिया था ..बेटा जो सबसे छोटा था ..वो भी घर में सबसे लम्बा हो गया था ..और रौबदार भी ..बेटे के रूप में पैदा होना भी अपने आप में एक सत्ता हासिल करने जैसा होता है ..जिसमे बेटे को बिना दिए हीं ..वो सारे अधिकार प्राप्त हप्ते हैं ..जिनकी परिकल्पना भी बेटियों के मन में नही उठती ..खैर ..सब कुछ ठीक –ठाक हीं तो चल रहा था ..और समय समय पर एक निम्न –मध्यमवर्गीय परिवार जिस तरह की समस्याओं से गुजरता है उससे गुजरता रहता है ..जिसमे ज्यादातर समस्याओं की जड़े आर्थिक ताने –बाने से जुड़ी होती है ..पर म्त्कुरी को बाबू जी का खिन्न मन और उदास आँखे हमेशा कचोटती रहती थी  ..उसे पता था ..अपने बच्चों के खिलखिलाहट के बीच भी उसके बाबू जी ..कहीं ना कहीं अवसाद से घिरे हुए हैं ...बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद बा ने बड़ी मुशिकलो से ..बाबू जी की परवरिश की थी ..कहते हैं जब ससुराल पक्ष मजबूत होता है तो मायके वाले भी ..ज्यादा गुड़मय होते हैं ..और सारे रिश्ते अपने स्नेह के फुहारे छिड़काते रहते है ..(घर दही त बाहरो दही) ..सो ऐसा हीं हुआ ..धीरे –धीरे मायके वालो ने बा से दूरी बनानी शुरू कर दी ...खैर इन सबसे कुछ ज्यादा फर्क नही पड़ा ..बस हुआ इतना हीं की ..जहाँ बाबू जी से पहली पांचो भाई –बहन , तीन टाइम लुल्हुआअ डूबा के दूध भात खाते थे ..बाबू जी का बचपन ..माड़ –भात और आचार रोटी के भरोसे बीता ..आभाव में इन्सान ज्यादा जिम्मेदार हो जाता है ..सो बाबू जी भी हो गये ..जमीन लिखवाने से लेकर ..खेती बाडी सबकुछ छोटे होने के कारण बाबू जी की जिम्मेदारी बन गई ..और इन सब से समय निकाल कर कालेज करना भी होता था ..दोनों भाई शहर में रहते है अपनी अपनी पत्नियों के साथ ..जिनके लिए बाबू जी महज एक टहलूक थे ..अपने पतियों को जिमाने के बाद भाभिया बाबू जी को बचा- खुचा परोसा करती थी ..कभी –कभी ये कहानी बताते वक्त बा की आँखे पनिया जाती थी ..और अब बा के जाने के बाद बाबू जी और भी अकेले हो गये हैं ..(बाबू जी) यानि बउवा  के लिए दुनिया में सबसे प्रिय कुछ था तो उनके बड़े भाई ..बउवा यानि (बाबू जी) उनकी कोइ भी परिकल्पना भैया के बिना अधूरी थी ..एक बार जब ६७ -६६ की अकाल में बउवा(बाबू जी) भैया भाभी के साथ रहने गये तो दो साल तक लगातार रहे ..बुउव के लिए वो दो साल जीवन के सबसे अनमोल पल बन गये ..भैया उनके लिए महज बड़े भाई नही ..पिता के साक्षात्कार थे ..उन दो सालो की एक एक घटना बाबू जी की जेहने में ओस की बूंदों सी ताजी है ..दो साल पहले जब मटकुरी बाबू जी के सात नैनी गई थी ..किसी काम से तो उनसे ..देखा बाबू जी की आँखों में मोती सी चमक आ गई उन रास्तो ..को देखकर ..जहाँ पे टहलते घूमते उन्होंने भैया के साथ दो साल गुजारे थे ..वो एक एक करके सारी कहानी मटकुरी को सुनाने लगे ..और अपना पुराना टूटा फूटा स्कूल दिखाया ..उस दिन मटकुरी को एहसास हुआ की ..बाबू जी जिन्हें साहित्य से कुछ लेना देना नही है ..जिनके पास बड़े हीं भावनात्मक और कलात्मक शब्दों का संग्रह नही हैं ..जिन्हें बाते ना तो बनानी आती है और ना आते हैं ..बहाने गढने ..उनके अंदर भी भावनाओ का ऐसा सैलाब है ....बचपन और रिश्ते...खून की तरह रगों में बहते हैं ..जिनकी रफ्तार कम ज्यादा हो सकती है पर ..पर इनकी गर्माहट कभी खत्म नही होती ..बाबू जी कि भी यही समस्या थी ..अपने सगे सम्बन्धियों से दूरी उनको खाए जा रही थी ...पर नजदीकिय बढ़ाने की उनकी सारी कोशिशे नाकामयाब हो चुकी थी ..बड़ी बेटी की शादी को लेकर बाबू जी ज्यादातर तनाव ग्रस्त रहा करते हैं ..बाबू जी तिलक लेकर नही गये थे ..मझली काकी के मुताबिक सबको पता था की लड़का नालायक है पर किसे ने बाबू जी को नही बताया ..और तिलक लेकर जाने वालो में सबसे आगे ..बड़का भैया थे ..खैर बात खुली और धीरे धीरे पता चला बाबू जी और उनके अपने परिवार के अलावा ज्यादा तर लोग ये जानते थे ..की बाबू जी गलत घर में बिटिया को भेज रहे हैं ..पर किसी ने भी ये बात बाबू जी को नही बताई ..इस बात को लेकर माँ और बाबू जी के बीच अक्सर तनाव हुआ करता  पर ..बाबू जी के मन ने इस बात को कभी नही स्वीकारा की उनके बड़े भाई उनके साथ कोइ छल करेंगे ..उसके बाद एक बाद एक ऐसी घटनाये हुई की अंत में बाबू जी को मनना पड़ा की ..खून के रिश्तो में भी छलावा होता है ..पर ये छलावा उनकी आँखों की चमक को  मध्हम कर गया है ..बाबू जी का मन ये मानने को आज भी तैयार नही की उनके अपने उनसे दूरिया बनाना चाहते हैं ..क्योकि रिश्तो के भी सामाजिक और आर्थिक पैरोकार होते है  ..पर भावनाओ का कोइ ऐसा पैमाना नही होता ..बाबू जी के पास दो बेटियां हैं ..और दो अनब्याही सयानी बेटियों का पिता जिसने ..समाज से इतर जाके अपनी बेटियों को जंजीरों में बांधने के बजाय ..आजादी के पंख दिए ..बाबू जी के इस जुल्म की सजा तो उन्ही को भोगनी होगी क्योंकि उन्होंने अपनी बेटियों को भीड़ का हिस्सा नही बनाया..उनकी बेटियों का अपना वजूद है ..उनकी बेटियों को जीवन जीने के लिए किसे रिश्ते की फ्रेम की जरूरत नही है ..उनकी बेटियां बिना इस फेम के भी ..अपनी राह पर बेखौफ चल सकती हैं ...बाबू जी की बेटियां जवाब देना जानती है ..उन्होंने अपनी बेटियों को आवाज दी ..इन गुनहाओ की सजा बाबू जी को भोगनी  तो पड़ेगी हीं ..बाबू जी और तमाम बाबू जी ..को सजा भुगतनी होगी ..क्योंकि अत्याधुनिक चमक –धमक कपड़ो , गाड़ियों, ऐसो आराम और पार्टियों के बीच .समाज के बड़े हिस्से की मानसिकता आज भी कालकोठरी में सड़ रही है