..बाबू जी हर वक्त उदास
से रहते हैं ..उनका मन खिन्न रहता है ..बड़ी बेटी की शादी में मात खाने के बाद
उन्होंने निश्चय किया कि अब अपन दोनों बेटियों को तब तक नही ब्याहेंगे जब तक दोनों
अपने पैर पर ना खड़ी हो जाये ..माने दुनिया को जानने समझने ना लगे ..सब कुछ ऐसा हीं
तो हो रहा था ..दोनों बेटियां देश के दो बड़े –बड़े संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल
कर रही थी ..बड़ी बेटी ने भी जैसे तैसे खुद को दुनिय से लड़ने के लिए तैयार कर लिया
था ..बेटा जो सबसे छोटा था ..वो भी घर में सबसे लम्बा हो गया था ..और रौबदार भी
..बेटे के रूप में पैदा होना भी अपने आप में एक सत्ता हासिल करने जैसा होता है
..जिसमे बेटे को बिना दिए हीं ..वो सारे अधिकार प्राप्त हप्ते हैं ..जिनकी
परिकल्पना भी बेटियों के मन में नही उठती ..खैर ..सब कुछ ठीक –ठाक हीं तो चल रहा
था ..और समय समय पर एक निम्न –मध्यमवर्गीय परिवार जिस तरह की समस्याओं से गुजरता
है उससे गुजरता रहता है ..जिसमे ज्यादातर समस्याओं की जड़े आर्थिक ताने –बाने से
जुड़ी होती है ..पर म्त्कुरी को बाबू जी का खिन्न मन और उदास आँखे हमेशा कचोटती
रहती थी ..उसे पता था ..अपने बच्चों के
खिलखिलाहट के बीच भी उसके बाबू जी ..कहीं ना कहीं अवसाद से घिरे हुए हैं ...बचपन
में पिता के गुजर जाने के बाद बा ने बड़ी मुशिकलो से ..बाबू जी की परवरिश की थी
..कहते हैं जब ससुराल पक्ष मजबूत होता है तो मायके वाले भी ..ज्यादा गुड़मय होते
हैं ..और सारे रिश्ते अपने स्नेह के फुहारे छिड़काते रहते है ..(घर दही त बाहरो
दही) ..सो ऐसा हीं हुआ ..धीरे –धीरे मायके वालो ने बा से दूरी बनानी शुरू कर दी
...खैर इन सबसे कुछ ज्यादा फर्क नही पड़ा ..बस हुआ इतना हीं की ..जहाँ बाबू जी से
पहली पांचो भाई –बहन , तीन टाइम लुल्हुआअ डूबा के दूध भात खाते थे ..बाबू जी का
बचपन ..माड़ –भात और आचार रोटी के भरोसे बीता ..आभाव में इन्सान ज्यादा जिम्मेदार
हो जाता है ..सो बाबू जी भी हो गये ..जमीन लिखवाने से लेकर ..खेती बाडी सबकुछ छोटे
होने के कारण बाबू जी की जिम्मेदारी बन गई ..और इन सब से समय निकाल कर कालेज करना
भी होता था ..दोनों भाई शहर में रहते है अपनी अपनी पत्नियों के साथ ..जिनके लिए
बाबू जी महज एक टहलूक थे ..अपने पतियों को जिमाने के बाद भाभिया बाबू जी को बचा-
खुचा परोसा करती थी ..कभी –कभी ये कहानी बताते वक्त बा की आँखे पनिया जाती थी ..और
अब बा के जाने के बाद बाबू जी और भी अकेले हो गये हैं ..(बाबू जी) यानि बउवा के लिए दुनिया में सबसे प्रिय कुछ था तो उनके
बड़े भाई ..बउवा यानि (बाबू जी) उनकी कोइ भी परिकल्पना भैया के बिना अधूरी थी ..एक
बार जब ६७ -६६ की अकाल में बउवा(बाबू जी) भैया भाभी के साथ रहने गये तो दो साल तक
लगातार रहे ..बुउव के लिए वो दो साल जीवन के सबसे अनमोल पल बन गये ..भैया उनके लिए
महज बड़े भाई नही ..पिता के साक्षात्कार थे ..उन दो सालो की एक एक घटना बाबू जी की
जेहने में ओस की बूंदों सी ताजी है ..दो साल पहले जब मटकुरी बाबू जी के सात नैनी
गई थी ..किसी काम से तो उनसे ..देखा बाबू जी की आँखों में मोती सी चमक आ गई उन
रास्तो ..को देखकर ..जहाँ पे टहलते घूमते उन्होंने भैया के साथ दो साल गुजारे थे
..वो एक एक करके सारी कहानी मटकुरी को सुनाने लगे ..और अपना पुराना टूटा फूटा
स्कूल दिखाया ..उस दिन मटकुरी को एहसास हुआ की ..बाबू जी जिन्हें साहित्य से कुछ
लेना देना नही है ..जिनके पास बड़े हीं भावनात्मक और कलात्मक शब्दों का संग्रह नही
हैं ..जिन्हें बाते ना तो बनानी आती है और ना आते हैं ..बहाने गढने ..उनके अंदर भी
भावनाओ का ऐसा सैलाब है ....बचपन और रिश्ते...खून की तरह रगों में बहते हैं
..जिनकी रफ्तार कम ज्यादा हो सकती है पर ..पर इनकी गर्माहट कभी खत्म नही होती
..बाबू जी कि भी यही समस्या थी ..अपने सगे सम्बन्धियों से दूरी उनको खाए जा रही थी
...पर नजदीकिय बढ़ाने की उनकी सारी कोशिशे नाकामयाब हो चुकी थी ..बड़ी बेटी की शादी
को लेकर बाबू जी ज्यादातर तनाव ग्रस्त रहा करते हैं ..बाबू जी तिलक लेकर नही गये
थे ..मझली काकी के मुताबिक सबको पता था की लड़का नालायक है पर किसे ने बाबू जी को
नही बताया ..और तिलक लेकर जाने वालो में सबसे आगे ..बड़का भैया थे ..खैर बात खुली
और धीरे धीरे पता चला बाबू जी और उनके अपने परिवार के अलावा ज्यादा तर लोग ये
जानते थे ..की बाबू जी गलत घर में बिटिया को भेज रहे हैं ..पर किसी ने भी ये बात
बाबू जी को नही बताई ..इस बात को लेकर माँ और बाबू जी के बीच अक्सर तनाव हुआ करता पर ..बाबू जी के मन ने इस बात को कभी नही
स्वीकारा की उनके बड़े भाई उनके साथ कोइ छल करेंगे ..उसके बाद एक बाद एक ऐसी घटनाये
हुई की अंत में बाबू जी को मनना पड़ा की ..खून के रिश्तो में भी छलावा होता है ..पर
ये छलावा उनकी आँखों की चमक को मध्हम कर
गया है ..बाबू जी का मन ये मानने को आज भी तैयार नही की उनके अपने उनसे दूरिया
बनाना चाहते हैं ..क्योकि रिश्तो के भी सामाजिक और आर्थिक पैरोकार होते है ..पर भावनाओ का कोइ ऐसा पैमाना नही होता ..बाबू
जी के पास दो बेटियां हैं ..और दो अनब्याही सयानी बेटियों का पिता जिसने ..समाज से
इतर जाके अपनी बेटियों को जंजीरों में बांधने के बजाय ..आजादी के पंख दिए ..बाबू
जी के इस जुल्म की सजा तो उन्ही को भोगनी होगी क्योंकि उन्होंने अपनी बेटियों को
भीड़ का हिस्सा नही बनाया..उनकी बेटियों का अपना वजूद है ..उनकी बेटियों को जीवन
जीने के लिए किसे रिश्ते की फ्रेम की जरूरत नही है ..उनकी बेटियां बिना इस फेम के
भी ..अपनी राह पर बेखौफ चल सकती हैं ...बाबू जी की बेटियां जवाब देना जानती है
..उन्होंने अपनी बेटियों को आवाज दी ..इन गुनहाओ की सजा बाबू जी को भोगनी तो पड़ेगी हीं ..बाबू जी और तमाम बाबू जी ..को
सजा भुगतनी होगी ..क्योंकि अत्याधुनिक चमक –धमक कपड़ो , गाड़ियों, ऐसो आराम और
पार्टियों के बीच .समाज के बड़े हिस्से की मानसिकता आज भी कालकोठरी में सड़ रही है
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