भावनाओ का भी अपना क्लास होता है........
अक्सर शाम को जब मैं टहलने जाती हूँ तो जानबूझकर उस पीछे वाले रस्ते से जाती हूँ, जहाँ तमाम कुत्ते मुंह बाये भौं-भौं करते रहते हैं पता नही क्या मजा आता है. उन्हें इतना गला फारने में पर मैं भी आदत से मजबूर हूँ जाती हूँ उसी रास्ते से दरअसल बात यह है कि मुझे उसको देखना होता है..उसकी उम्र यही कोइ १३ से १५ के बीच की होगी. ये बच्ची अपने परिवार के साथ रहती हैं. एक छोटी सी गुमटी जैसी है और थोडा सा हास्टल का छत है जिसने इस गुमटी को टिकाया हुआ है..घर में बहुत सारे लोग है जो आपस में कचर मचर बतियाते रहते हैं और उनकी बतियान से ये जान पड़ता है कि या तो ये लोग गाजीपुर या बलिया के आस पास के हैं.
जब भी मैं गुजरती हूँ तो देखती हूँ वो या तो बहुत सारे कपड़े धो रही होती है या किसी बच्चे को गोद में लेकर सुला रही होती है ..या कभी गुस्से से किसी तीन चार साल के बच्चे कटोरी में सान कर कुछ खिला रही होती है..ना खईबे रे न खईबे हसुआ से काट देब अबे मुडिया न खईबे त जनले....कुछ ना कुछ वो ऐसे हीं काम में व्यस्त होती है.....उसका चलना फिरना, बोलना बतियाना सब कुछ ऐसा है जैसे वो खुद एक बच्ची ना हो कोई कुशल गृहणी हो..उसका इतना कुशल हो जाना मुझे खटकता है..वो क्यों इतनी समझदार जैसी हो गई है ..नासमझी और मासूमियत के इस उम्र में इतना समझदार और वयस्क हो जाना भी तो मौलिकता का खत्म हो जाना हीं तो है ना...मुझे नही पता की वो स्कूल भी जाती है की नही वैसे मैंने उसे कभी किताबो के साथ नही देखा है ना ही खेलते हुए और ना हीं किसी सखी सहेली से बतियाते हुए... और न हीं मुस्कुराते हुए..वो बस रमी रहती है अपने उम्र से ज्यादा के कामो में एक मोंनोटोनस सा भाव बना रहता है उसके चेहरे पर..वैसे ये किसी एक लडकी की कहानी नही है ज्यादातर लडकियों और महिलाओ की परिस्तिथी लगभग एक समान हीं तो है मोनोटोनस..चंद लोग आस पास और उनकी जरूरते उनलोगों के सुविधा के अनुसार अपने रुटीन को ढालना और फिर शिकायते..झिडकी सुनने के लिए इजी टारगेट होना..समय और जरूरत हीं नही समझा जाता इनके मन और भावनाओ को समझान..भावनाओ का भी क्लास होता है..और मनो का भी अपना अपना पोजीशन ..
जब भी मैं गुजरती हूँ तो देखती हूँ वो या तो बहुत सारे कपड़े धो रही होती है या किसी बच्चे को गोद में लेकर सुला रही होती है ..या कभी गुस्से से किसी तीन चार साल के बच्चे कटोरी में सान कर कुछ खिला रही होती है..ना खईबे रे न खईबे हसुआ से काट देब अबे मुडिया न खईबे त जनले....कुछ ना कुछ वो ऐसे हीं काम में व्यस्त होती है.....उसका चलना फिरना, बोलना बतियाना सब कुछ ऐसा है जैसे वो खुद एक बच्ची ना हो कोई कुशल गृहणी हो..उसका इतना कुशल हो जाना मुझे खटकता है..वो क्यों इतनी समझदार जैसी हो गई है ..नासमझी और मासूमियत के इस उम्र में इतना समझदार और वयस्क हो जाना भी तो मौलिकता का खत्म हो जाना हीं तो है ना...मुझे नही पता की वो स्कूल भी जाती है की नही वैसे मैंने उसे कभी किताबो के साथ नही देखा है ना ही खेलते हुए और ना हीं किसी सखी सहेली से बतियाते हुए... और न हीं मुस्कुराते हुए..वो बस रमी रहती है अपने उम्र से ज्यादा के कामो में एक मोंनोटोनस सा भाव बना रहता है उसके चेहरे पर..वैसे ये किसी एक लडकी की कहानी नही है ज्यादातर लडकियों और महिलाओ की परिस्तिथी लगभग एक समान हीं तो है मोनोटोनस..चंद लोग आस पास और उनकी जरूरते उनलोगों के सुविधा के अनुसार अपने रुटीन को ढालना और फिर शिकायते..झिडकी सुनने के लिए इजी टारगेट होना..समय और जरूरत हीं नही समझा जाता इनके मन और भावनाओ को समझान..भावनाओ का भी क्लास होता है..और मनो का भी अपना अपना पोजीशन ..