Sunday, October 16, 2011

नीली बस की यादें


कुछ नहीं भूलने वाली यादों के चलते भोपाल की सड़को पर साँप की तरह सरसराती इन नीली बसों ने मेरी जहऩ में एक खास जगह बना ली है। जिनमें कुछ ऐसी घटनायें घटी की मन को न चाहते हुए भी एकदम से अपनी तरफ खींच लिया।

वो नाराज थी

वो नाराज थी शुरु से हीं नाराज थी मैं जैसे हीं नीली बस में शाम को 6 बजे बैठी तारीख मुझे मेरी लापारवाहीं के चलते याद नहीं परंतु वो नाराज और एकदम गुस्से में थी मेरे बस में बैठने के थोड़ी देर के बाद हीं 22-23 साल या उससे भी कम की एक नवविवाहिता और उसका नवविवाहित पति मेरे बगल में आकर बैठे पर लड़की मेरे पास बैठी थी और पति से मुँहफेरकर वो मेरी तरफ मुँह फेरकर बैठ हुयी थी। उसके अनुसार वो पूरे साज-सज्जा में थी एकदम चमकती हुई साड़ी, लाल बिन्दीया डिजाईन वाली और माथे पर लाल चमकता सिंदूर और पैरों में रंगीन चमचमती सी नई चप्पल और साथ हीं चमकते बाजार की सस्ते आभूषणों से सजी हुयी वो लड़की मेरे आकर्षण का केन्द्र ना बनती अगर वो गुस्से में अपने पति से मैथलि में ना कहती हमरा नई टोकू यानि मुझसे बात मत करीये वो भी पूरे लहजे के साथ उसके इस एक शब्द ने जैसे मेरा ध्यान भंग कर दिया मैं जो अपने आप में व्यस्त खिड़की के बाहर की चहल-पहल को चलती बस से देखने में व्यस्त थी दोस्तों के दिन भर के आये हुए एसएमएम के जवाब देने में लगी थी एक दम से उसकी बातों को सुनकर मेरे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान दौर गई और मैंने सब छोड़-छाड़ कर उसकी तरफ ध्यान केन्द्रित कर लिया। क्योंकि मैं जान गई थी वो लड़की मैथिल हैं और गुस्से में भी मेरी प्रिय मातृभाषा मैथिलि में बात कर रहीं है। उसके पति का कोई परिचित उस बस में मिल गया जो भोपाली स्टाईल में पूछ रहा था क्या हो गया भाभी जी को तूने जरुर न्यूमार्केट मे भारी शोपिंग नहीं करनी दी होगी और पेसे बचाने के चक्कर में भाभी को नाराज कर डाला। और अपनी इन अदाओँ से नाराज लड़की को रिझाने का असफल प्रयत्न कर रहा था पर मजाल थी कि भूल से भी उसके चेहरे पर मुस्कान की एक लहर दौर जाए। पति ने बार- बार उसका हाथ पकड़ा मुस्कुराया परंतु उसकी नाक-भौ जो सिकुड़ी थी वो जस की तस सिकुड़ी रही और अब तो इस रिझाने मनाने के कार्यक्रम में उसके आँखों से आँसू भी छलक पड़े जिससे उसने अपनी आँचल की कोड़ो से तत्काल पोंछ लिया परंतु उसके नाक फूल गये और गाल लाल हो गये। इसी बीच नीली बस झील को पार करती हुयी काली माँ के मंदिर पहुँच गयी बस में मौजूद सभी धार्मिक महिलाओं ने मंदिर की घंटी सुनकर प्रणाम किया पर उसने मंदिर की तरफ देखा भी नहीं इस नाराजगी के दौरान उसके पति ने अपने चाईना हैण्डसेट से उसको गीत भी सुनाये कुछ फोटो भी दिखाने की कोशिश की परंतु वो ना मानी। कई स्टापों से गुजरती हुई बस जब बस सुभाष नगर बस स्टाँप पर रुकी तो वह जल्दी से खड़ी हो गयी और मैथिली में यह बोलते हुए की इहै मे बईसाबइ लै आनने छलहों एगों टेम्पू नई कैल भेलन हमरा लै कहते हुए नीचे उतर गयी यानि की इसी बस में बिठाने के लिए मुझे लाए थे एक आँटो रिक्शा नहीं कर सकते थे मेरे लिए और जल्दी जल्दी बस से उतर कर आगे- आगे और उसका पति पीछे-पीछे चल दिये परंतु वो तब तक नहीं मानी थी मेरी नजरे उसकी चाल को देख रहीं थी की तभी बस नये यात्रियों को अपने सवार करती हुई चल दी और मैं उसकी बचकानी बातें और मासूम नाराजगी को सोच-सोच कर मुस्कुराती हुयी अपने प्रेस-काँम्पलेक्स बस स्टैण्ड पर उतर गयी। और मुझे पता चल चुका था कि आज जब आसमान में उड़ना हवाई जहाज पर बैठना आम बात हो गयी है तो इस पंख वाली दुनिया में वो आँटो में बैठने के लिये नाराज थी।

कुछ यादें

बहुत दिनों से एक कहानीयों की श्रृखंला शुरु करना चाह रही थी परंतु कार्य की व्यस्तता के चलते समय नहीं निकाल पायी परंतु आज जनसत्ता के एक लेख ने मुझे इस कदर उद्वेलित कर दिया कि मुझे लगा जो भी हो समय निकाल कर अगर प्रतिदिन सम्भव नहीं हो पाया तो कभी-कभार हीं सही अपने विचारों को अपने ब्लाग पर जरुर बिखेरुंगी जिससे कभी फुरसत में खुद के विचारों को पढ़कर कर समझ कर अपने राय विचार का आकलन कर पाउं अअनुभव के मुताबिक मैने महसूस किया कि कार्य की व्यस्तता के दौरान हीं हमारे दिमाग में कितने संवेदनशील और महत्वपूर्ण बाते, विचार और कुछ यादें कौंध जाती है जो कि जितनी तिब्रता से कौंधती हैं उतनी हीं तिब्रता से हमारे दिमाग से फिसल भी जाती हैं। शायद ये विचार ये परखने की कोशिश करते हैं की हमको इनकी कदर हैं कि नही जिनकों इनकी कदर होती है वे अपने हर एक विचार और अनुभवों को कलमबद्ध करते चले जातें हैं जिसके कई उदाहरण हमारे महान लेखकों की श्रृखंला है।

खैर इन बातों के पहले मैनें जिस कहानी श्रृखंला की चर्चा की थी उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए बताना चाहूंगी कि ये कोई मेरे मन से गढ़ी हुयी कहानीयों की श्रृखंला नहीं होगी बल्कि ये वो यादे है और अनुभव है जिससे मैने 1 महिने 8 दिनों तक महसूस किया। बात ज्यादा पुरानी नहीं 1 जुलाई 2011 से 8 अगस्त 2011 के बीच की हैं। इन दिनों हमारे अंतिम सेमेस्टर की इम्तिहान समाप्त हो चुके थे और सभी की तरह मैं भी नौकरी की तालाश में थी परंतु बात कुछ बनी नहीं मन में उदासी थी और घर से भी आ गई थी। इस बीच मैने स्पंदन में कार्य करना शुरु किया जिसका आँफिस न्यूमार्केट रंगमहल के पास है। मुझे रोज सुबह दस से पहले नीली बस न्यूमार्केट के लिये बस लेनी होती थी। जिसके लिए मैं भागी भागी प्रेस काम्पलेक्स के बस स्टैण्ड पर खड़ी हो जाती थी। जाते वक्त तो इस बस में कभी-कभार हीं बैठने के लिए जगह मिलती थी परंतु ना हीं समय से पहुंचने के ख्याल के अलावा दिमाग में और किसी ख्याल के लिए रत्ती भर जगह होती थी, लेकिन शाम को आते वक्त बस में जगह भी ढेर सारी होती थी और सोचने, समझने देखने के लिए दिमाग और मन में भी ढेर सारी जगह होती थी। इसी बीच सारी बाते तो नहीं परंतु कुछ छोटी-मोटी छितराई सी ऐसी बातें हैं जो मन और दिमाग में एकदम से बैठ गयी जिनका जिक्र मैं इस कहानी श्रृखंला के रुप में करना चाहती हूं।