Saturday, December 7, 2013

सब पढ़े आगे बढ़े

नंगे खाली धूल भरे पैर                                                             
उजड़े-बिखरे बाल
किचड़ से सनी बासी ऑखें
क्षत- विक्षत लगे शर्ट के बटन
और पिछे से फटे नीले पैंट
पीठ के पीछे टंगे बस्तो में
चिथड़े –कागजो के बीच
सटील का चमकता कटोरा,
बहुत कम कमरो में हम
ज्यादा से ज्यादा कक्षाएं
चलाना जानते हैं
हमारे टेंडर वाले मास्टर
कक्षा में बाते बनाना जानते हैं
किताबें और ज्ञान की बातें
बेमानी सी लगती है
अब तो ये पुराने
जमाने की लगती है,
इस सुधारवादी दौर में
हम खुद से ऑखें नही
मिला पा रहे हैं
तमाम कोशिशो के बावजूद
हम ज्यादातर लोगों को सिर्फ
साक्षर बना पा रहे हैं
कोई क्या बिगाड़ लेगा हमारा
हम सारे देश को मूर्ख बना रहे हैं
दिवारो पर तो हमने लिख हीं दिया हैं
और पर्चे और बैनर लगा रहे हैं
पूरे जोश से सब पढ़े आगे बढ़े
का नारा लगा रहें हैं.