Sunday, April 17, 2022

छोटे शहर वाला मन

छोटे शहर वाला मन

इस भागम-भाग वाली जिन्दगी में अपने आस-पास भी कुछ देख पाना कहाँ आसान होता है, इस जटिल प्रतियोगिता वाले दौर में जहाँ हर कदम पर एक नई जंग टाइप का सीन होता है, जिस में हर मिनट का हिसाब होता है, जिस हड़बड़ी को बहुत ही ख़ूबसूरती से टाइम इज करेंसी कह देते हैं . खैर इन सब के  बीच जब तेज रफ़्तार में चलती हुई, आत्मविश्वास से लबरेज लड़कियों को मेट्रो शहर की रफ़्तार के साथ कदमताल करते  देखती हूँ तो लगता है तमाम अनिश्चिताओं के बीच कुछ तो गुलमोहर सा है, इस मेट्रो शहर तक पहुँच पाने  की राह में आई  तमाम कठिनाइयों, जटिलताओं और कईयों की संदेह से भरी आँखों के प्रभाव को तोड़ यहाँ तक पहुँच पाना  अपने सपनों की पगडंडियों पर लड़खड़ाते-सँभालते हुए चल पाना आसान नही होता होगा किसी भी  पूजा,सुजाता और श्वेता के लिए...पर कई बार देखती हूँ, लड़कियों को फोन पर  किसी को मनाते हुए, कॉल क्यों नही कर पाई, बिजी थी, सफाईयां देते हुए, रोते हुए, सिसकते हुए, ....तो मन करता है... उनका हाथ पकड़ कर पूंछू...क्यां इन्ही दलीलों को पेश करने आई थी...ये आम है आज-कल ये टॉक्सिक रिलेशनशिप कई बार सुसाइड जैसे खतरनाक मोड़ पर पंहुचा देते  है, डर लगता है किसी को इस तरह बिलखते हुए देखकर, पर कभी हिम्मत नही हुई की  किसी को चुप करा सकूं,... बहुत पर्सनल और इंडिविजुअलिस्टिक होता है, मेट्रो शहर का स्ट्रक्चर...पूरा का पूरा मशीनी...गिव एंड टेक के फार्मूला पर आधारित इस शहर में भीड़ तो बहुत है, पर इस भीड़ में हर कोई पूरी तरह अकेला, इस बड़े शहर में कभी -कभी घबरा जाता है, मेरा ये छोटे शहर वाला मन.

#lifeinmetro


Monday, February 28, 2022

इंसानिया की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए किताबों वाले दिनों का होना बहुत जरूरी है.....

 

ये समय ऐसा चल रहा है, जब हमारे ये नई-पीढ़ी के नौजवान कुछ सीखने से ज्यादा जताने को महत्व देते हैं, आरोप प्रत्यारोप इनके जीवन का हिस्सा हो गया है, ...ये प्रवृति जो युवाओं में विकसित हो रही है, जिसमे किसी विषय की गंभीरता को समझे बिना ...सिर्फ अपनी सतही समझदारी के स्तर पर फैसला सुना देना...ये बहुत गंभीर विषय और भयावह मुद्दा  है... डिजिटल जोक्स और रील के जमाने में संवेदनाए, और मानवीय मूल्य के विषय इन्हे मज़ाक लगते हैं, नॉलेज के मायने इनके लिए टेक्निकल ही हैं, साहित्य बोरिंग और यूसलेस है, सामाजिक सरोकार के मुद्दे इन्हे बकवास लगते हैं….ये सारे तथ्य किसी भी देश के सतत विकास के लिए बहुत भयावह है.... सारे रेसौर्सेस, में ह्यूमन रेसौर्स जैसा महत्वपूर्ण कुछ नही है....तमाम, इमराते, विज्ञान और मूर्तिया व्यर्थ हो जाएंगी यदि हम अपने युवाओं और बच्चों को शिक्षा के सही मायने समय रहते नही सीखा पाएंगे तो सब कुछ धरा का धारा  रह जाएगा ....ये संवेदनाओं और समूहिक सरोकार की कमी ही है कि आय दिन आत्म-हत्या जैसी घटनाएं हमें सुनाई देती हैं....इनसे बचने के लिए हमें सीखना होगा अपने बच्चों को सिखाना होगा, अपने नौ-जवानों से बात करनी होगी और किताबों वाले दिनों का आगाज़ करना होगा...जहाँ उपन्यास और कहानिया सिर्फ कोर्स-वर्क के अलावा हमारे हर दिन का हिस्सा हो....इंसानिया की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए किताबों वाले दिनों का होना बहुत जरूरी है.....