जमाना बद्ल गया है आज
महिलाये किसी भी
क्षेत्र में पुरुषो से कम
नहीं हैं तमाम संवैधनिक
अधिकरो के साथ साथ सरकार चुनने
की कमान भी
महिलाओ के हाथ में वर्षो
पहले थमाई जा चुकी है. यही नही इसके साथ- साथ चारदीवारी
के अँदर भी
महिलाए सुरक्षित
रहे इसको लेकर भी सरकार ने सॅवेदना जताई और
घरेलू हिंसा
अधिनियम 2005 पास कर दिया. क्या है इन
सब मतलब समझ नही आता कहा तक
महिलाए जागरुक
हैं अपने बारे में ये
किसी से छुपी हुई बात नही है.
यदि तमाम महिलाओ में से
एक महिला
कुछ अलग कर
लेती है तो
इसका मतलब ये
तो नही की
इसका महिमामॅडन
समस्त महिलओ
के सँदर्भ
में किया जाये . छोटे से छोटे और बडे से बडे फैसलो मे आज
भी पुरुषो
का एकाधिकार
कायम है. एक
लालसा थी कि
शिक्षा के प्रसार से जगरुकता और सशक्तिकरन की भावना का विकास होगा परँतु ये तथ्य भी कही ना कही पूरी तरह से असफल साबित
हो रही है.
कहने को तो
पूरे देश में शिक्षा
का प्रसार
हो रहा है. जिसमें लड्किया
भी कदमताल
बनाए हुए हैं. परँतु शिक्षा
महज किताबो
और ज्यादा
से ज्यादा
श्योर सिरिज
तक सिमटती
जा रही है.
ये स्थिति
विशेषकर ग्रामीण
और सेमी- अरबन क्षेत्रो
में देखने
को ज्यादा
मिल रही है.
जहॉ आज अधिकतर लोगो के
पास कम से
कम बी.ए
की डिग्री
देखने को मिल हीं जाती है. महाविद्यालयों में प्रवेश के समय लोग न
जाने कैसे कैसे जुगाड
लगने को तैयार रह्ते
है, कि
इतनी ललक कभी किताबों
में लगाने
को शायद हीं तैयार
होते हैं ऐसी स्थिति
का सबसे खतरनाक और भयावह असर उन
महिलओ और युवतियों पर पड्ता है जो
फार्म भरने से
लेकर रिजल्ट
देखने के लिए भी भाई, पिता या पति पर निर्भर होती हैं, ऐसी शिक्षा
का क्या मतलब है जिसका दूर दूर तक सशक्तिकण से कोई वास्ता
ही ना हो.
आज
भी महिलओं
को कुछ बंधे हुए प्रोफेश्न में बांध कर रख
दिया गया है
जैसे टीचर,
नर्स और ज्यादा हुआ तो
डॉक्टर और कहीं अगर प्रोफेश्न बदल भी
गया तो मानसिक संरचना
में कोई परिवर्तन नहीं आया है. जन्म से लेकर जीवन के
अंत तक अधिकांशतः महिलाएं
ऐसी सामाजिक
व्यवस्था का शिकार होती हैं. जहॉ उनकी स्थिति सदैव दोयम हीं होती है. कहते हैं अर्थिक समपन्न्ता
और निर्भरता
महिलाओं को सशक्तिकरण के मार्ग पर प्रशस्त करती है.
परंतु ये विचार भी खोखले साबित
हो रहें हैं समाज आज
भी महिलाओं
के संदर्भ
में ऐसी मानसिक विपन्नता
से घिरा हुआ है कि
जिसका असर महिलाओं के सोचने समझने
और जानने
के दृष्टिकोण
को जानकर
साफ पता चल
जाता है.
आज
भी घर से
लेकर बाहर ह्र्र जगह महत्वपूर्ण पदो पर
पुरुष हीं आसीन पाये जाते हैं इस
जकडी हुई मानसिकता के समाज और देश का पूर्णतया विकास
असंभव सा लगता है. महिलाओं के प्रति आज भी
मानसिक और भावनत्मक रुप से
समाज गरीब हीं लगता है.
तमाम तरह के संवैधानिक अधिकार
महिलाओं का दे
दिए गए हैं परंतु
बहुत कम ऐसी महिलाएं
हैं जो महिलाओं से जुडी हित व्यव्स्था की जानकारी भी रखती है. एन.
सी. आर.
बी की रिपोर्ट की बात करें तो
साल दर साल महिलओं
पर हो रहे शारीरिक
और मानसिक
अत्याचार के आँकडे दिनो दिन उछलते
हीं जा रहें हैं. जबकि ये भी
पूरी तरह सत्य है कि
ज्यादा से ज्यादा इन मुद्दों से जुडे मामले
प्रकाश में हीं नहीं आते.
कयोंकि आज भी
ये समाज दोहरी मानसिकता
से घिरे लोगों का हीं है जहॉ उन्हीं
महिलाओं के प्रति आदर भाव रखा जाता है जो
पति और ससुराल का जुल्म सहते हुए भी अबला नारी की
भूमिका बिना किसी शिकायत
के निभाए
जा रहीं हैं . और
यदि किसी महिला ने जुल्म के खिलाफ पह्ल करते हुए तलाक ले लिया तो फिर देखिए
आते जाते,
सोते जागते
किस प्रकर
उसे भीष्म
पितामह की भॉति शब्द रुपी बाण से
पल- पल
और क्षण- क्षण घायल होना पडता है.
जहॉ ज्यादा
से ज्यादा
लोग इस बात को तो
जरुर जानते
और मानते
हैं कि जुल्म सहने वाला भी उतना हीं गुनहगार होता है
जितना कि जुल्म करने वाला.
इस दोहरी
मानसिकता के समाज के मापदण्ड भी दोहरे हैं. जहॉ कुछ बाते महिलाओं
के लिए गुना
है वहीं बात पुरुषों के लिए आम बात है. खुले और आजाद ख्यालों
की
महिलओं को सामाजिक कटाक्ष का सामना आज भी
करना पड रहा है. सामाजिक और वैचारिक तौर पर
आज भी ज्यादातर महिलाएं
किसी कोने में कुढती
सी प्रतित
होती हैं. और
इस कुढन को
इन्होने अपनी नियती मान ली
है..यदि कोई महिला समय से
पहले विधवा
हो जाए या
किसी दुराचार
का शिकार
जिसमे उसकी लेश मात्र
भी गलती नही होती फिर भी न
जाने कैसे- कैसे तर्क लगाकर महिलाओं
को हीं दोषी ठहराया
जाता है. जिससे महिलओं
को न जाने कैसे- कैसे भयावह
शारीरिक और मानसिक यातनाओं
का सामना
करना पडता है.
इन तमाम वेदनओं से महिलओं को तब
गुजरना पडता है, जब
उन्हें सबसे ज्यादा भावनात्मक
सहारे की जरुरत होती है..ऐसा नहीं की इस
समाज में सारे के सारे असंवेदनशील
लोगो. का
ही. जमावडा है. इस
भीड में कुछ ऐसे भी
लोग हैं जो
कुछ संवेदनशील
है. पर
ऐसे लोगो की
संख्या अनुपात
से भी कम
है. परमा, फायर, बाजार, अस्तित्व, वाटर और पिंजड इत्यादि
कुछ ऐसी फिल्मों के उदाहरण हैं जो
महिलाओं के प्रति समाज के
दोहरे मानसिकता
की पुष्टि
करते है.. आज
आवश्यकता इस बात की है
कि विकस के
सही मायने
को समझा जाए जिसमें
मानसिक विकास
का ज्यादा
तबज्जो दिया जाए..एक
ऐसे विकस का
सपना साकार
हो जिसमे
दोहरे मापदण्ड
के लिए कोई जगह ना
हो. जहॉ किसी का सोशल डेथ का
शिकार ना होना पडे,
जहॉ हर किसी को मुस्कुरने और खिलखिलाने का बराबर अवसर प्राप्त हो.