Tuesday, September 23, 2014
Tuesday, September 9, 2014
भुट्टे वाली
भुट्टे वाली
हर रोज तो गुजरती थी
मैं उस सड़क से जो मेन गेट की ओर मुड़ती है पर मैने कभी ध्यान नहीं दिया था, पर बाद में अचानक एक दिन मेरा ध्यान गया कि कैसे
वो महिला विश्वविधालय की गेट से निकलने वाले हर व्यक्ति को गौर से और कौतूहल से
निहारा करती है कि कहीं इनमें से कोई भुट्टे खरीदने वाला ना हो.
सात - आठ साल के एक
कमजोर और बीमार बेटे के साथ गहरे नाक नक्श की वो महिला एक छोटे से पंखे से कोयले
के थोड़े बहुत अंगारो को सुलगाये जा रही थी और उस पर रखे दो चार भुट्टो की तरह दो
चार लोग भी उसको घेरे हुए थे. कितना टाईम लगेग़? जल्दी करो, और वो
महिला इन शब्दो को सुनते हीं जैसे एक दम से चौकन्नी हो जाती थी और अंगारो को तेज
तेज हवा करने लगती थी..और एक सुर में बोलने लगती बस बस हो गया दुईये मिनट और
लगेगा. पसीना उसके माथे से बहकर ऑखों में चला जाता तो वो बड़ी तेजी से उनको ऑचल के
कोरो से पोछ लेती थी, और वो छोटा बच्चा कैशियर का काम कर रहा था, पैसे लेता और वापस करने का काम करता, बीच बीच मे मॉ उसको हिदायत दिये जा रही थी कि
ठीक से गिनना कहीं ज्यादा मत वापस कर देना तु इहो कर देते हो तुम्हारा कोई भरोसा
नहीं है. बच्चे को को अपने काम में बड़ा मजा आ रहा था वो शान से दस – दस के नोट
गिने जा रहा था पर उसे मॉ का टोकना ना भाया उसने तुरंत जवाब दिया पहिले गड़बड़ा देते
थे पर अब हम बड़का भईया से बढिया नोट गिन लेते हैं. मॉ मुस्कुरा दी और साथ में मुझे
भी हंसी आ गई, पर मेरे साथ में जो कोई भाई शाहब खड़े थे उनकी
भाव भंग़िमा में कोई परिवर्तन नहीं दिखा.
मैने पूछा कौन सी
क्लास में पढ़ते हो?
जवाब: टू में
अच्छा – अच्छा
मेरे बाद वाले
ग्राहक को बड़ी जल्दी थी पर मेरा मन था कि
थोड़ी देर यहां और ठहरा जाए. महिला मेरा मुंहे देखने लगी मैने कहा पहले इनको दे
दीजिए. बच्चे से बात हो चुकी थी अब मेरा मन था की थोड़ा मॉ से भी बतिया लिया जाए. भुट्टा
लेकर वो व्यक्ति चला गया. अब उस महिला ने मुझसे पूछा कौन सा भुट्टा भूंजू मैडम जी
मैने जवाब दिया कोई सा भी जो आप को सही लगे.
मैने पूछा ये कोयला
कहां से लाती हैं?
“ मत पूछिए मैडम जी
जब भुट्टा लेने जाती हूं वहीं से लाती हूं, चार बजे भोरे उठकर
जाना होता है, बड़ा महंगाई हो गया है और गरीब आदमी का जीना हराम
हो गया है”
कहॉ की रहने वाली
हैं?
“क्या पूछती हैं
मैडम जी हम बिहार के रहने वाली हूं”
बिहार में कहॉ से?
“आप लोगो को नही पता
होगा हमारा गॉव झंझारपुर के पास है”
उसने जिस गॉव का नाम
बताया वो मुझे ध्यान नहीं आ रहा
आपके पति भी यही काम
करते हैं ?
“ नही वो टिकुली, बिन्दी, बाला कंगन सब बेचते
हैं क्या कहें मैडम जी चार गो धिया पुता है सबको डिल्ली जैसे जगह पर पढा लिखा रहीं
हूं “
बेटा तो बड़ा होशियार
है आपका?
“ सबको टूशन लगाई
हूं नहीं तो स्कूल के पढाई पर तो नामो पारने नही आयेग”
बेटी किस क्लास में
हैं ?
“ दसमी में है
बियाहने वाली हो गई है पर कहॉ से क्या करूंगी माथा पगलाया रहता है पैसा कौड़ी
जुमेगा तब ना बियाह दान होगा और आज कल घर दुवार बेच दीजिए फिर भी दान दहेज नहीं
पूरा होता है और ये कोढिया शराब तो और हम गरीब लोगों का खून चूस लिया है मर्द सब
सारा जिम्मेदारी भूलकर जैसे हीं चार गो पैसा कमाता है बोतल धकेल लेता है, घर में आग लग जाए कोनो मतलब नहीं हैं”
आपको देख के तो नही
लगता आपकी इतनी बड़ी बेटी होगी?
“मुस्कुराते हुए और
शरमाते हुए पहले जल्दी ना शादी बियाह हो जाता था और हमारे समय में तो कितनी लड़कियो
का बचपने में शादी हो जाता था अब तो सब अपने बियाह में अपने नाचता गाता है हम लोग
अपना बियाह दुरागमन मे इतना रोते कानते थे कि मत पूछिए”
कितना आमदनी हो जाता
है?
“ आमदनी क्या होगा
अब तो साग तरकारी पर भी आफत है, महंगाई के चलते भर
पेट रोटी नून मुश्किल हो रहा है, चाह कर भी दो पैसा
नही बचा पाते”
अब भुट्टा पक कर
तैयार था ओह क्यों ये इतना जल्दी पक गया ऐसा हीं ख्याल मेरे मन में आया था.
महिला बेटे से बोली
ठीक से नमक नीम्बू लगाकर दो दीदी के भुट्टा में, मैने
भुट्टा लिया पैसे दी और चल दी, और सोचती रही उस
महिला के बारे में जिसके पास ना समय है ना समझ है राजनीति, विदेशी मुद्दो,
अर्थव्यवस्था की और ना हीं महिला सशक्तिकरण जैसे किसी शब्द से उसको लेना देना है.
क्योंकि ये सारी चोचले बाजी पेट भरने के बाद हीं सूझती है और वो महिला अपने और
अपने परिवार की पेट की भूख की राजनीति और अर्थव्यवस्था में इतनी तल्लीन है कि उसे
और किसी से कुछ लेना देना नहीं है.
खैर उस दिन के बाद
से मेरे और उस महिला के बीच एक मुस्कान की दोस्ती हो गई है. वो यहीं कहीं मेरे
कमरे के अगल बगल कहीं रहती है. हम दोनो जब भी एक दूसरे को देखते हैं बस मुस्करा
देते हैं..............(सोनम झा)
Thursday, June 19, 2014
Mofussil Musings: सत्ता जंगल में माओवादियों को निर्दोष आदिवासियों से...
Mofussil Musings: सत्ता जंगल में माओवादियों को निर्दोष आदिवासियों से...: कवासी लखमा एक आदिवासी हैं, उन लाखों सामान्य आदिवासियों की तरह जो मध्य भारत में चल रहे लगभग गृहयुद्ध में फंसे हुए हैं. पर फिर, वह उनमे से ...
Tuesday, March 25, 2014
अलाउड नहीं है...
अलाउड नहीं है...
बस गुजर रही थी, TR-1 ये बैरागढ़ के पहले से आती है और शायद आकृति से दूर तक जाती है मुझे
ठीक से नहीं पता. ये भोपाल शहर की खासियत है कि यहां कोई भी सवारी हो जल्दी से एक
जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती हैं और जबसे पिछले चार सालो से ये लाल बसे भोपाल की
सड़को पर सरपट दौरने लगी हैं भोपाल शहर की तो रौनक हीं बढ गयी है. बहुत सारे नामो
के साथ इन बहुत सारी लाल बसों ने शहर भर के लोगों का मन मोह लिया है कुछ उन लोगो
को छोड़कर जिनको नही पता बस की एक अलग दुनिया होती है. जब ये बसे चलती हैं शहर भर की सारी बसे अपनी किस्मत को कोसने लगती
है कि हम भी लाल बस क्यों नहीं हैं, बसों के समाज में इन लाल बसों का बड़ा जबरद्स्त
रुतबा है, और इन बसों की चाल के दिवाने तो पूरे शहर भर के
लोग हैं, जब ये किसी एक मोड़ से दूसरे मोड़ के लिए मुड़ती है
तो लगता है गुलमोहर की फूलो से लदी डालिया लचक उठी हो और जब एक स्टैण्ड पर खड़ी हो
जाती है तो मानो लाल फूलो से लबा लब भरी डलिया हो.
उस शाम को सवा आठ बजे
होंगे मैने बोर्ड ऑफिस से बस ली और संयोग से मुझे सीट मिल गई शाम के समय सीट मिल
जाना अपने आप में बड़ी बात है और साथ ही गौरव की बात आखिर कुर्सी मिलना मालूली बात
नही होती, कोई कुर्सी बिना प्रतियोगिता के नही मिलती बस की सीट भी नही, इसके लिए चौकन्नी
ऑखों की प्रतियोगिता होती है जैसे हीं आप चुके कुर्सी किसी और की हुई.
बस चुपचाप अपना काम करती
हुई आगे बढ़ रही थी कभी कुछ लोग बस पर सवार हो जाते थे तो कुछ लोग़ बस से उतर जाते
थे.
तभी बस और जगहो की तरह
हबीबगंज बस स्टैण्ड पर रुकी और यहां पर एक महिला, एक पुरुष, एक छोटी बच्ची और एक ट्रंक बस में सवार हो गये. सीट नही थी काफी लोग पहले
से हीं सीट की ताक में चौकन्ने खड़े थे. महिला ने अपना ट्रंक जमाया और बेटी को गोद
में लेकर बैठ गई, ना जाने क्यों चमकते दमकते लोगों को छोड़कर मेरा पूरा ध्यान उस महिला
पर था. मैने पहले बक्सा देखा तो मुझे याद आया ऐसा हीं एक जस्ते वाला ट्रंक मेरे
“बा” के पास भी था जिसे लेकर वो प्रयाग कल्पवास करने जाती थी. मैने उसके पैरो में
नई लखानी की चप्पल जैसी चप्पल देखी तो मुझे बचपन याद आ गया कि कैसे मैं खुश हो
जाती जब पापा पिचके भूरे डिब्बे में मेरे लिए चप्पल लेकर आते थे तो मैं कितना खुश
हो जाती थी पर चप्पल के डिब्बे को देखकर मन दुखी हो जाता था कि कितना पिचका है इसका तो घर भी नही
बन पायेगा गुड़िया के लिए और मै चुपचाप प्यार से पापा से पूछती थी पापा इसका दूसरा
डिब्बा मिल जायेगा क्या? पापा के कुछ बोलने से पहले दीदी कहती फेको चुपचाप इस डिब्बे को पूरा
घर कबाड़ घर बना कर रखी हों, और हम डर कर डिब्बे को ताखे में छुपाकर रख देते थे, ओह कितनी यादों की
मोटरियां थी इस महिला के पास.
खैर ये सारी बातें तो
अचानक दिमाग में कौध गई थी, चक-चक लाल सिंदूर, दोनो हाथ भर कड़ा सहित लाल कामदार पक्की चूड़ियां, खिची-तनी साड़ी के
प्लेट्स, और फिसलता ऑचल और बिखड़े रुखे बाल, बस यही वो श्रृंगार थे जिन्होने मेरा पूरा ध्यान अपने तरफ खिंच लिया
था शहर के लोगो के लिए ये देहाती बातें थी और उनके लिए जिनकी जड़े गॉव में है उनके
लिए अपनी बाते, क्योकि मुझे पता है कुछ दिनो में वो श्रृंगार के नये- नये रुप सिख
जायेगी, फिर वो भीड़ का हिस्सा हो जायेगी कोई उसे ध्यान से नही देखेगा.
महिला बक्से पर बैठी रही
और उसका पति उससे दूर जाकर हो गया, महिला उसको बार बार बुला रही थी कि वो भी आकर उस बक्से पर बैठ जाये
और उसके पास हीं रही पर पति शहरी होते है तो उसे पता था कि बस के आगे के पोर्टन
में पुरुषों का खड़ा होना अलाउड नही है. बस खचा खच रंग बिरंगे लोगों से भरा हुआ था.
महिला की ऑखों में चैन नही था उसकी बेचैन ऑखे परेशान हो जाती थी जैसे हीं उसका पति
किसी और के पति के पीछे छिप जाता था. सो वो लगातार बेटी को सीने से चिपकाये एकटक
पति को निहारे जा रही थी. तभी अचानक एक सीट खाली हो गई तो महिला उसको पकड़ कर खड़ी
हो गई और जोर जोर से आवाजें लगानेलगी “इहां आ जाइये” सीट खाली है दूसरी महिलाओं ने
समझाने की कोशिश की पर वो किसकी सुनने वाली थी नही “इहां उ बैठेंगे” “बहुत देर से
खड़े है जनरल डिब्बे से आये हैं हमलोग जबलपुर में गाड़ी चार घंटे बाद पकड़ाई है, वो अपने आप में
बड़-बड़ाती रही तभी 12 न. बस स्टैण्ड आ गया पति ने आवाज लगाई यहां उतरना है वो
भुनभुनाई अभी सीट मिला तो उतरने का समय हो गया. पति ने आकर बक्सा उठाया और बोला एकदम देहाती हो हम इस सीट पर नही बैठ
सकते यहां आदमी का बैठना अलाउड नही हैं, वो सब उतर गये और मैं खिड़की से जब तक उनको देख पा रही थी देखती रही, उस छोटी सी मुलाकात
ने मेरे गॉव, मेरे बचपन से जुड़ी यादों की पोटली को मेरे सामने खोल कर रख दिया. और
अच्छा लगा जानकर पुरुषो को भी अब पता चल रहा है कुछ बातें उनके लिए भी अलाउड नही
हैं,
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