Tuesday, September 9, 2014

भुट्टे वाली

भुट्टे वाली
हर रोज तो गुजरती थी मैं उस सड़क से जो मेन गेट की ओर मुड़ती है पर मैने कभी ध्यान नहीं दिया था, पर बाद में अचानक एक दिन मेरा ध्यान गया कि कैसे वो महिला विश्वविधालय की गेट से निकलने वाले हर व्यक्ति को गौर से और कौतूहल से निहारा करती है कि कहीं इनमें से कोई भुट्टे खरीदने वाला ना हो.
सात‌ - आठ साल के एक कमजोर और बीमार बेटे के साथ गहरे नाक नक्श की वो महिला एक छोटे से पंखे से कोयले के थोड़े बहुत अंगारो को सुलगाये जा रही थी और उस पर रखे दो चार भुट्टो की तरह दो चार लोग भी उसको घेरे हुए थे. कितना टाईम लगेग़? जल्दी करो,  और वो महिला इन शब्दो को सुनते हीं जैसे एक दम से चौकन्नी हो जाती थी और अंगारो को तेज तेज हवा करने लगती थी..और एक सुर में बोलने लगती बस बस हो गया दुईये मिनट और लगेगा. पसीना उसके माथे से बहकर ऑखों में चला जाता तो वो बड़ी तेजी से उनको ऑचल के कोरो से पोछ लेती थी, और वो छोटा बच्चा कैशियर का काम कर रहा था, पैसे लेता और वापस करने का काम करता, बीच‌ बीच मे मॉ उसको हिदायत दिये जा रही थी कि ठीक से गिनना कहीं ज्यादा मत वापस कर देना तु इहो कर देते हो तुम्हारा कोई भरोसा नहीं है. बच्चे को को अपने काम में बड़ा मजा आ रहा था वो शान से दस – दस के नोट गिने जा रहा था पर उसे मॉ का टोकना ना भाया उसने तुरंत जवाब दिया पहिले गड़बड़ा देते थे पर अब हम बड़का भईया से बढिया नोट गिन लेते हैं. मॉ मुस्कुरा दी और साथ में मुझे भी हंसी आ गई, पर मेरे साथ में जो कोई भाई शाहब खड़े थे उनकी भाव भंग़िमा में कोई परिवर्तन नहीं दिखा.
मैने पूछा कौन सी क्लास में पढ़ते हो?
जवाब: टू में
अच्छा – अच्छा
मेरे बाद वाले ग्राहक को  बड़ी जल्दी थी पर मेरा मन था कि थोड़ी देर यहां और ठहरा जाए. महिला मेरा मुंहे देखने लगी मैने कहा पहले इनको दे दीजिए. बच्चे से बात हो चुकी थी अब मेरा मन था की थोड़ा मॉ से भी बतिया लिया जाए. भुट्टा लेकर वो व्यक्ति चला गया. अब उस महिला ने मुझसे पूछा कौन सा भुट्टा भूंजू मैडम जी मैने जवाब दिया कोई सा भी जो आप को सही लगे.
मैने पूछा ये कोयला कहां से लाती हैं?
“ मत पूछिए मैडम जी जब भुट्टा लेने जाती हूं वहीं से लाती हूं, चार बजे भोरे उठकर जाना होता है, बड़ा महंगाई हो गया है और गरीब आदमी का जीना हराम हो गया है”
कहॉ की रहने वाली हैं?
“क्या पूछती हैं मैडम जी हम बिहार के रहने वाली हूं”
बिहार में कहॉ से?
“आप लोगो को नही पता होगा हमारा गॉव झंझारपुर के पास है”
उसने जिस गॉव का नाम बताया वो मुझे ध्यान नहीं आ रहा
आपके पति भी यही काम करते हैं ?
“ नही वो टिकुली, बिन्दी, बाला कंगन सब बेचते हैं क्या कहें मैडम जी चार गो धिया पुता है सबको डिल्ली जैसे जगह पर पढा लिखा रहीं हूं “
बेटा तो बड़ा होशियार है आपका?
“ सबको टूशन लगाई हूं नहीं तो स्कूल के पढाई पर तो नामो पारने नही आयेग”
बेटी किस क्लास में हैं ?
“ दसमी में है बियाहने वाली हो गई है पर कहॉ से क्या करूंगी माथा पगलाया रहता है पैसा कौड़ी जुमेगा तब ना बियाह दान होगा और आज कल घर दुवार बेच दीजिए फिर भी दान दहेज नहीं पूरा होता है और ये कोढिया शराब तो और हम गरीब लोगों का खून चूस लिया है मर्द सब सारा जिम्मेदारी भूलकर जैसे हीं चार गो पैसा कमाता है बोतल धकेल लेता है, घर में आग लग जाए कोनो मतलब नहीं हैं”
आपको देख के तो नही लगता आपकी इतनी बड़ी बेटी होगी?
“मुस्कुराते हुए और शरमाते हुए पहले जल्दी ना शादी बियाह हो जाता था और हमारे समय में तो कितनी लड़कियो का बचपने में शादी हो जाता था अब तो सब अपने बियाह में अपने नाचता गाता है हम लोग अपना बियाह दुरागमन मे इतना रोते कानते थे कि मत पूछिए”
कितना आमदनी हो जाता है?
“ आमदनी क्या होगा अब तो साग तरकारी पर भी आफत है, महंगाई के चलते भर पेट रोटी नून मुश्किल हो रहा है, चाह कर भी दो पैसा नही बचा पाते”
अब भुट्टा पक कर तैयार था ओह क्यों ये इतना जल्दी पक गया ऐसा हीं ख्याल मेरे मन में आया था.
महिला बेटे से बोली ठीक से नमक नीम्बू लगाकर दो दीदी के भुट्टा में, मैने भुट्टा लिया पैसे दी और चल दी, और सोचती रही उस महिला के बारे में जिसके पास ना समय है ना समझ है राजनीति, विदेशी मुद्दो, अर्थव्यवस्था की और ना हीं महिला सशक्तिकरण जैसे किसी शब्द से उसको लेना देना है. क्योंकि ये सारी चोचले बाजी पेट भरने के बाद हीं सूझती है और वो महिला अपने और अपने परिवार की पेट की भूख की राजनीति और अर्थव्यवस्था में इतनी तल्लीन है कि उसे और किसी से कुछ लेना देना नहीं है.

खैर उस दिन के बाद से मेरे और उस महिला के बीच एक मुस्कान की दोस्ती हो गई है. वो यहीं कहीं मेरे कमरे के अगल बगल कहीं रहती है. हम दोनो जब भी एक दूसरे को देखते हैं बस मुस्करा देते हैं..............(सोनम झा) 

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