Tuesday, November 23, 2010
स्नेह की बरसात
Saturday, October 9, 2010
मैं खुश हूँ..
Friday, August 27, 2010
ये बजाय क्यों आ जाता है.?.
Friday, May 21, 2010
रिश्ते.......
जिन्दगी हमें बहुत कुछ बताती है, बहुत कुछ सिखाती है। शायद जो हम नही सीखना चाहते वो भी जिन्दगी की भेड़-चाल में सीख ही जाते हैं और इन सभी उतार-चढ़ाव के बीच हम किसी को साथ पाते हैं तो वो हमारे अपने ही होते हैं, पर यहाँ भी एक समस्या मुँह बनाये खड़ी है। ये अपने है कौन, अपनों की परिभाषा क्या है? क्या अपने केवल वो हैं जिनसे हमारे खून के रिश्ते जुड़े होते है, या कहलाने को वो हमारे रिश्तेदार होते हैं, या फिर वो जिन्हें हम अपने हमसफर के तौर पर देखने लगते हैं उनके एहसास को समझने लगते हैं? पर शायद मेरी नजर में अपने और अपनेपन की परिभाषा एकदम अलग है। मुझे लगता है या कहूँ जहाँ तक मैने रिश्तों को समझा है लगा कि अपने वो होते हैं जिनसे हमारे दिल जुड़ते हैं। जिन्हें हम समझते हैं और जो हमे समझते हैं। वही तो अपने होते हैं जो हमारी भावनाओं से जुड़े होते हैं। सबसे प्यारा रिश्ता होता है माँ और बच्चे का क्या इससे भी अपना कोई रिश्ता होगा परंतु यदि हम इतिहास के पन्नों मे झाँक कर देखें तो पाते हैं कि यशोदा, कृष्ण की सगी माँ नही थीं। फिर भी क्या यहाँ किसी प्रकार से अपनेपन की भावना कम दिखती है, नही दिखती है क्योंकि रिश्ते तो भावनाओं से जुड़ते हैं।
इसी तरह हूमायूँ- पदमिनी का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता जो सिर्फ एक धागे से बन गया। तभी तो कहा गय़ा है दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है। पर ऐसे लोगों की कमी भी नही है जो न जाने किन दुर्भावनाओं के शिकार है जिन्हें ना तो रिश्तों की समझ है और ना ही अपनेपन की वो तो हर रिश्ते को फायदे नुकसान के तराजू पर तौलते हैं और अपने गंदे विचारों के मद्देनजर हर रिश्ते की बखिया उधेड़ते है। जररुत इस बात कि है कि हम समझ पायें इन दुर्भावनाओं को और इन गंदी विचारों की तपिश से बचा पायें खुद को और बचा पायें अपने कोमल रिश्तों को …
ये सोचकर दरख्तों के नीचे छाँव होती है
हम बबूल के साये में आ के बैठ गये।
और पहचान पायें ऐसे लोगों को जिनके लिये रिश्तों के कुछ मायने ही नही हैं। ये सारी बाते मैंने भोपाल आकर सीखी हैं जो मेरे भविष्य में जरुर काम आयेगी क्योंकि इससे पहले तो जिसने मुझसे अच्छे से बात कर ली वो अच्छा हो गया। पर यहाँ आकर मैने जाना-
जब भी जी चाहे नयी दुनिया बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं............
तो क्या किया जाय बस उपाय यही है कि जहाँ तक हो सके इन भेड़ियों से दूर रहा जाय।
सोनम झा
Friday, March 19, 2010
स्पेशल मैरिज एक्ट
जाति और धर्म से बाहर अपना जीवन साथी चुनने के लिये अब युवाओं को ज्यादा सोचने विचारने की जरुरत नही होगी। ये सोचने वाली बात है कि जब आज का युवा अपने हिसाब से अपनी पढाई का चुनाव करता है अपने इच्छा अनुसार अपने फैसले लेता है तो शादी जैसे जरुरी फैसले में उन्हे इतना समस्याओं का सामना क्यो करना पड़ता है। जी हां जब आज के युवा अपनी जिंदगी से जुड़े सभी फैसलो को जब स्वयं अंजाम दे रहे हैं तो शादी करने के लिए उन्हे किसी नोटिस की क्या आवश्यता है, ऐसा हमारे विधि मंत्री का कहना है। कानून के अनुसार स्पेशल मैरिज करने वालो के आवेदन करने पर अदालत 30 दिन का नोटिस देता है। जिसका उद्देश्य बाल विवाह और जबरन शादी करने से रोकना है। लेकिन अंतरजातीय मामलो मे ये अवधि खतरनातक रुप धारण कर लेती है। नोटिस के कारण आस पास के लोगो को तथा लड़का लड़की के घरवालो को उऩका पता लग जाता है। सरकार के अनुसार ये अवधि दोनो पक्षो के लोगों को उनके खिलाफ कदम उठाने का मौका देती है। इन सब बातों को ध्यान रखते हुए, स्पेशल मैरिज एक्ट में संशोधन किया जायेगा संशोधन के लिये गृह मंत्रालय ने विधि मंत्रालय से संशोधन ले लिया है। इसके पहले जो पहल होगा-(1) स्पेशल मैरिज एक्ट
(2) विधि मंत्राललय ने दी हरी झंडी,
(3) आंनर किलिंग रोकने मे भी मदद।
इस नये कानून वय्वस्था से जहां एक ओर युवाओं मे प्रसन्नता दिखाई देगी वही ऐसे लोग जो आज भी रुढिवादिता के जंजीरो में जकड़े हुये उनके लिये यह कानून समस्या की वजह बन जायेगी दोस्तो ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि क्या एक 18 साल की लड़की और 21साल का लड़का जो अभी पूरी तरह दुनीयादारी समझ हीं नहीं पाये हैं वो अपने जीवन से जुड़े इतने अहम फैसले का निर्धारण स्वयं कर पायेंगे।
मगर दोस्तो आप लोगों को नही लगता समाज में इससे जो बदलाव आयेगा उसके बाद जो होगा उसमें सबसे प्रमुख बात यह होगी की युवा बिना सोचे समझे जीवन से जुड़ा इतना अहम फैसला लेने लगेंगे।
परंतु इसके कुछ सकारात्मक पक्ष भी जरुर सामने आयेंगे जिसमे ऐसे युवा जो अपने पैड़ो पर खड़े हैं उन्हे बिना डरे अपने जीवन को जीने का अवसर प्राप्त होगा।