Tuesday, November 23, 2010

स्नेह की बरसात

स्नेह की बरसात अपनो का प्यार ये सब बाते हीं सिर्फ अभी मेरे जे़हन मे घूम रही हैं क्योकिं अभी बस एक हीं दिन तो हुआ तो है मुझे अपनों से दूर आये हुये। बातों बातों मे न जाने कब गुजर गये 25 दिन मुझे पता भी नही चला। हर बार की तरह इस सेमेस्टर में भी यही फेसला हुआ था कि ज्यादा दिन नहीं रहना है घर पर क्योकि घर पर पढाई नहीं हो पाती है। फिर भी कुछ किताबे तो साथ गयी हीं थी जिनको खोलकर देखने की भी जहमत नही उठाई गयी। ये कहानी सिर्फ मेरी हीं नही ज्यादातर हमारे सारे दोस्तों की यही कहानी है। जो यही सोचकर घर गये थे कि परिक्षायें करीब है इस बार तो कुछ पढाई करेंगे हीं

Saturday, October 9, 2010

मैं खुश हूँ..

बहुत दिनों से थी जिसकी तालाश वो चीज मुझे मिल गई। सोचा ना था इतनी आसानी से अपने आप मेरे द्वार तक आ पहुंचेगी बस एक पल पहले तक मुझे नही मालूम था। जैसे ही पता चला मैं इतनी खुश हुयी की क्या कहू? मैं बात कर रही हूं अपने प्रिय मैथिली गीतों के कलेक्शन की जिसकी तालाश मैं तब से कर रही थी जबसे मुझे इन गीतों की मिठास का एहसास हुआ। बात दो साल पहले की है, मैं अपने गाँव अमैठी जो कि दरभंगा जिले मे स्थित है,जहाँ मैं अपने जन्म से लेकर अभी तक शायद एक साल भी नही रही हूं,लेकिन मुझे जितना प्यार अपने गाँव से है अपने वहाँ के घर से है इतना प्यार मुझे किसी जगह से नही। कितना अच्छा लगता है मुझे देहात और वहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू इसके आगे तो सारी दुनिया जैसे मामूली सी नजर आने लगती है। क्या हुआ की मैं वहाँ नही जा पाती बार-बार पर वहाँ की यादों से कभी बाहर भी तो नहीं निकल पाती। और मेरे उसी प्यारे गाँव के प्यारे से आँगन में मैने सुना था इन प्यारे गीतों के धुन को और थिरक उठे पैर और मचल उठा मन और शुरु कर दी मैनें शुरु कर दी तालाश मैनें उन गीतों की जो मुझे मिल हीं गये भोपाल मे आकर। यही कारण है मेरी खुशी का और कुछ नहीं।.......प्रितम आईन दिय् हमरा बरेली के कंगना काईल्ह जेबइ घुमई लै संगी के अंगना .........ये है उनमे से गीत...

Friday, August 27, 2010

ये बजाय क्यों आ जाता है.?.

छोड़ आये हम वो गलियां ये गाने के बोल नही जीवन की सच्चाई है। हम अपने भविष्य की चाह मे वर्तमान को छोड़ आते है, और छूट जाता है इसके साथ हीं अपनो का साथ हम दूर हो जाते हैं अपने परिवार से भाई-बहनों से अपने आँगन से,छत से और अपनी गलियों से इन सब के बावजूद ये हमारे साथ ही रहते हैं हमारे दिल में पर उससे क्या हुआ कि हम दूर रहते हैं पर इनका एहसास हमेशा हमारे साथ रहता है । फिर भी क्या साथ क्यों नही रहते ये सब जीवन भर क्यों कुछ दिन साथ रहने के बाद ये यादों के गलियारों मे कहीं सिमट से जाते हैं और रह-रह कर तड़पाते हैं क्या यही है जीवन अपनों से दूर होना।वो दोस्तो के साथ दौड़ने के बजाय बस के साथ दौड़ना, मम्मी से नाराज होने के बजाय किसी की नारीजगी का सामना करना होता सबकुछ है पर बस इन सभी में बजाय लग जाता है पर क्यों लग जाता है बजाय ये समझ नही आता। और बार- बार यही होता है जिनको पकड़ा हाथ समझकर वो केवल दस्तानें निकले ।

Friday, May 21, 2010

रिश्ते.......

जिन्दगी हमें बहुत कुछ बताती है, बहुत कुछ सिखाती है। शायद जो हम नही सीखना चाहते वो भी जिन्दगी की भेड़-चाल में सीख ही जाते हैं और इन सभी उतार-चढ़ाव के बीच हम किसी को साथ पाते हैं तो वो हमारे अपने ही होते हैं, पर यहाँ भी एक समस्या मुँह बनाये खड़ी है। ये अपने है कौन, अपनों की परिभाषा क्या है? क्या अपने केवल वो हैं जिनसे हमारे खून के रिश्ते जुड़े होते है, या कहलाने को वो हमारे रिश्तेदार होते हैं, या फिर वो जिन्हें हम अपने हमसफर के तौर पर देखने लगते हैं उनके एहसास को समझने लगते हैं? पर शायद मेरी नजर में अपने और अपनेपन की परिभाषा एकदम अलग है। मुझे लगता है या कहूँ जहाँ तक मैने रिश्तों को समझा है लगा कि अपने वो होते हैं जिनसे हमारे दिल जुड़ते हैं। जिन्हें हम समझते हैं और जो हमे समझते हैं। वही तो अपने होते हैं जो हमारी भावनाओं से जुड़े होते हैं। सबसे प्यारा रिश्ता होता है माँ और बच्चे का क्या इससे भी अपना कोई रिश्ता होगा परंतु यदि हम इतिहास के पन्नों मे झाँक कर देखें तो पाते हैं कि यशोदा, कृष्ण की सगी माँ नही थीं। फिर भी क्या यहाँ किसी प्रकार से अपनेपन की भावना कम दिखती है, नही दिखती है क्योंकि रिश्ते तो भावनाओं से जुड़ते हैं।
इसी तरह हूमायूँ- पदमिनी का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता जो सिर्फ एक धागे से बन गया। तभी तो कहा गय़ा है दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है। पर ऐसे लोगों की कमी भी नही है जो न जाने किन दुर्भावनाओं के शिकार है जिन्हें ना तो रिश्तों की समझ है और ना ही अपनेपन की वो तो हर रिश्ते को फायदे नुकसान के तराजू पर तौलते हैं और अपने गंदे विचारों के मद्देनजर हर रिश्ते की बखिया उधेड़ते है। जररुत इस बात कि है कि हम समझ पायें इन दुर्भावनाओं को और इन गंदी विचारों की तपिश से बचा पायें खुद को और बचा पायें अपने कोमल रिश्तों को …
ये सोचकर दरख्तों के नीचे छाँव होती है
हम बबूल के साये में आ के बैठ गये।
और पहचान पायें ऐसे लोगों को जिनके लिये रिश्तों के कुछ मायने ही नही हैं। ये सारी बाते मैंने भोपाल आकर सीखी हैं जो मेरे भविष्य में जरुर काम आयेगी क्योंकि इससे पहले तो जिसने मुझसे अच्छे से बात कर ली वो अच्छा हो गया। पर यहाँ आकर मैने जाना-
जब भी जी चाहे नयी दुनिया बना लेते हैं लोग

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं............
तो क्या किया जाय बस उपाय यही है कि जहाँ तक हो सके इन भेड़ियों से दूर रहा जाय।
सोनम झा

Friday, March 19, 2010

स्पेशल मैरिज एक्ट

लगभग एक माह पहले विधि मंत्री एम.वीरप्पा मोइली ने स्पेशल मैरिज एक्ट में सुधार का प्रस्ताव रखा, जिसके तहत कोर्ट द्वारा मैरिज करने से पूर्व जो 30 दिन पहले नोटिस दिया जाता है अब उसकी कोई आवश्यकता नही होगी।
जाति और धर्म से बाहर अपना जीवन साथी चुनने के लिये अब युवाओं को ज्यादा सोचने विचारने की जरुरत नही होगी। ये सोचने वाली बात है कि जब आज का युवा अपने हिसाब से अपनी पढाई का चुनाव करता है अपने इच्छा अनुसार अपने फैसले लेता है तो शादी जैसे जरुरी फैसले में उन्हे इतना समस्याओं का सामना क्यो करना पड़ता है। जी हां जब आज के युवा अपनी जिंदगी से जुड़े सभी फैसलो को जब स्वयं अंजाम दे रहे हैं तो शादी करने के लिए उन्हे किसी नोटिस की क्या आवश्यता है, ऐसा हमारे विधि मंत्री का कहना है। कानून के अनुसार स्पेशल मैरिज करने वालो के आवेदन करने पर अदालत 30 दिन का नोटिस देता है। जिसका उद्देश्य बाल विवाह और जबरन शादी करने से रोकना है। लेकिन अंतरजातीय मामलो मे ये अवधि खतरनातक रुप धारण कर लेती है। नोटिस के कारण आस पास के लोगो को तथा लड़का लड़की के घरवालो को उऩका पता लग जाता है। सरकार के अनुसार ये अवधि दोनो पक्षो के लोगों को उनके खिलाफ कदम उठाने का मौका देती है। इन सब बातों को ध्यान रखते हुए, स्पेशल मैरिज एक्ट में संशोधन किया जायेगा संशोधन के लिये गृह मंत्रालय ने विधि मंत्रालय से संशोधन ले लिया है। इसके पहले जो पहल होगा-(1) स्पेशल मैरिज एक्ट
(2) विधि मंत्राललय ने दी हरी झंडी,
(3) आंनर किलिंग रोकने मे भी मदद।
इस नये कानून वय्वस्था से जहां एक ओर युवाओं मे प्रसन्नता दिखाई देगी वही ऐसे लोग जो आज भी रुढिवादिता के जंजीरो में जकड़े हुये उनके लिये यह कानून समस्या की वजह बन जायेगी दोस्तो ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि क्या एक 18 साल की लड़की और 21साल का लड़का जो अभी पूरी तरह दुनीयादारी समझ हीं नहीं पाये हैं वो अपने जीवन से जुड़े इतने अहम फैसले का निर्धारण स्वयं कर पायेंगे।
मगर दोस्तो आप लोगों को नही लगता समाज में इससे जो बदलाव आयेगा उसके बाद जो होगा उसमें सबसे प्रमुख बात यह होगी की युवा बिना सोचे समझे जीवन से जुड़ा इतना अहम फैसला लेने लगेंगे।
परंतु इसके कुछ सकारात्मक पक्ष भी जरुर सामने आयेंगे जिसमे ऐसे युवा जो अपने पैड़ो पर खड़े हैं उन्हे बिना डरे अपने जीवन को जीने का अवसर प्राप्त होगा।

Saturday, March 13, 2010

मेरी बात मेरी नयी शुरुआत है...

इस ब्लाग के माध्यम से मै अपने विचारो को लोगो के सामने रखना चाहती हूं, तथा इसमें अपने दोस्तो का साथ चाहती हूं।