Saturday, October 9, 2010
मैं खुश हूँ..
बहुत दिनों से थी जिसकी तालाश वो चीज मुझे मिल गई। सोचा ना था इतनी आसानी से अपने आप मेरे द्वार तक आ पहुंचेगी बस एक पल पहले तक मुझे नही मालूम था। जैसे ही पता चला मैं इतनी खुश हुयी की क्या कहू? मैं बात कर रही हूं अपने प्रिय मैथिली गीतों के कलेक्शन की जिसकी तालाश मैं तब से कर रही थी जबसे मुझे इन गीतों की मिठास का एहसास हुआ। बात दो साल पहले की है, मैं अपने गाँव अमैठी जो कि दरभंगा जिले मे स्थित है,जहाँ मैं अपने जन्म से लेकर अभी तक शायद एक साल भी नही रही हूं,लेकिन मुझे जितना प्यार अपने गाँव से है अपने वहाँ के घर से है इतना प्यार मुझे किसी जगह से नही। कितना अच्छा लगता है मुझे देहात और वहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू इसके आगे तो सारी दुनिया जैसे मामूली सी नजर आने लगती है। क्या हुआ की मैं वहाँ नही जा पाती बार-बार पर वहाँ की यादों से कभी बाहर भी तो नहीं निकल पाती। और मेरे उसी प्यारे गाँव के प्यारे से आँगन में मैने सुना था इन प्यारे गीतों के धुन को और थिरक उठे पैर और मचल उठा मन और शुरु कर दी मैनें शुरु कर दी तालाश मैनें उन गीतों की जो मुझे मिल हीं गये भोपाल मे आकर। यही कारण है मेरी खुशी का और कुछ नहीं।.......प्रितम आईन दिय् हमरा बरेली के कंगना काईल्ह जेबइ घुमई लै संगी के अंगना .........ये है उनमे से गीत...
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