एहसास –ए-गौरैया
हम छोटी छोटी तमाम चीजो से मिलकर बने है एहसास ,प्यार , लगाव , यादें
, रिश्ते, दोस्त और भी बहुत कुछ, इन सब के
बिना हमारे जीवन का कोइ मतलब नही है . हमारी जिन्दगी में हमारे बचपन की सबसे अहम भूमिका होती है और
इस बचपने को गौरैया ,तितली, सुग्गा (तोता ) हेलीकाप्टर वाली तितली, ये सब मिलकर इसको पूरा करते हैं. हम कितने जिज्ञासु हुआ करते
थे अपने बचपन में हर चीज के बारे में जानने को लेकर उतावले हर दूसरे पल हमारे पास
एक सवाल हुआ करता था, और कौतहल से भरी आँखे, कुछ भी नया हमे उत्साह से भर दिया
करता था.
गौरैया जिसकी टिमिर-टिमिर गोल गोल आँखे हमारी गलतियों की वजह से बहुत
उदास हो गईं हैं , गौरैया जो हमारे घर
आंगन में फुदकती रहती थी, दादी, बड़की माँ और माँ जो कुछ भी पछोड़ कर किनारे में
इक्कठा कर देती थी गौरैया हमेशा उसी से गुजारा कर लिया करती थी, उसने उपर से कभी
कुछ नही माँगा. गौरैया हमेशा जॉइंट फॅमिली में रही है इसलिए उसका इस सिंगल यूनिट
फॅमिली में मन नही लगता.
माँ बचपन में हम लोगो को एक किस्सा सुनाती थी ,जिसमे आंजुल नाम की एक
लड़की को उसकी भाभीया बहुत तंग करती थी और हमेशा कुछ ना कुछ मुश्किल काम में फंसा
दिया करती थी. एक दिन आंजुल को एक पथिया ( बांस का बना बड़ा टोकरा ) धान पकड़ा दिया
गया और बोला गया कि अगर आंजुल शाम तक सारे धान में से एक एक करके बिना टूटे चावल
नही निकाल लेगी तो उसे खान पीना नही दिया जायेगा, आंजुल परेशान होकर रोने लगी उसको
रोता हुआ देखकर गाछ से फुदककर एक गौरैया उसके पास आई और पूछा क्या हुआ? जब उसने
आंजुल की समस्या जानी तो उसने तुरंत गौरैया कमेटी की मीटींग बुलाई और सबने मिलकर
तय किया की आज कोइ भी दान चुनने नही जायेगा और सब लोग मिलकर आंजुल की मदद करेंगे
और सबने मिलकर शाम तक आंजुल के सारे धान से चावल निकाल कर उसकी समस्या का समाधान
कर दिया. और आंजुल खुशी –खुशी अपने घर चली गई और उन सारी गौरैया से उसकी खूब अच्छी
वाली दोस्ती हो गई.
ये सिर्फ एक कहानी नही ऐसी तमाम कहानिया हमारे बचपन को कल्पना का आधार
देते है, जिससे ये सब पेड़ पौधे पशु –पक्षी हमें अपने लगते हैं. पर चिजे बहुत तेजी
से पर बदल रही है प्राइवेसी की चाहत हमे दिनों दिन अकेला करती जा रही है . हम
माचिस के डिब्बे जैसे घरो की चाहत में सालो साल क़िस्त भरते है और इन किस्तों की
मार में हम अपनी जगह –जमीन , गाछी, टोल –मोहल्ला, रिश्ते , नाते सबसे इतने दूर हो
गये हैं कि की बस फेसबुक और व्हाटस तक
सिमटे हुए वास्तविक्त से आभास की दुनिया के होकर रह गये हैं. लोग अपने बच्चो को
अपनी बोली नही सिखाते उन्हें सख्त हिदायत होती है वो सिर्फ अंगेजी के शब्दों का
प्रयोग करेंगे, उन्हे दादी , नानी के किस्सों के बारे में कुछ नही पता उन्हें तो
इंटरनेट पर फेरी टेल देखने की आदत दिलाई जाती है . हम अपने बच्चो को उनके बचपने से
दिनों दिन दूर करते जा रहे है, हम लगातार एक ऐसी आभासी दुनिया के निर्माण में लगे
है जहाँ अवसाद हीं अवसाद है. गर्दन टेढ़ी कर के महज अंगरेजी में बात करन हीं जीवन
नही है ,जीवन बिना संवेदनाओ के ऐसा है जैसे कोमा में इंसान. हम अपने आप से दूर
होते जा रहे है दिखावे की दुनिया ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है हमारे पकवान की जगह
पिजा लेता जा रहा है और हमारे गीतों को कान चिनका देने वाली संस्कृती निगलती जा
रही है. तकनीक हर जरूरत का विकल्प तो नही
हो सकता . बदलवा और विकास के नाम पे हम खुद को छलते जा रहे हैं हम दिखावे की संगत
में खुद नई जरूरत तैयार करते है फिर उस जरूरत के लिए रोबट की तरह खटने में जुट
जाते हैं .
इन सब में हम बहुत कुछ खोते जा रहे है. हमने अपनी गौरैया को भी लग्गभग
खो दिया है झरोखो में एग्जाज फैन लग गये हैं और खिडकियों पर ए.सी को बिठा दिया गया
है तो ऐसे में कैसे आयेगी हमारी गौरैया हमारे पास , गौरैय तो कुतरा मुतरा अनाज खाती है उसे
पिज्ज्जा खाने नही आता फिर कैसे रहेगी हमारी गौरैया हमारे पास . हम एक हीं शहर में
गजते जा रहे है ..विकल्पों की कमी तो हैं हीं रोजगार नही है पर इस धक्कम-धुक्क्म
की रवायत जो शुरू हुई है इसमें हमने विकल्प के बारे में सोचन भी तो छोड़ दिया है
..हर कोई इन्जीनीर बनना चाहता है अपने बच्चो को बहुत कम है जिनकी ख्वहिश हो की उनके
बच्चे अध्यापक बने और समाज में शिक्षा और जागरूकता को लेकर पहल करे, पर ऐसा तो
शायद हीं कोइ होगा जो अपने बच्चे को किसान और माली बनाना चाहता हो की उसका बच्चा
खूब सारा आनाज पैदा करे और खुब सारे फल और फूल लगाये की गौरैया, तितली और कोयल,
मैना , सुग्गा सब खूब खुश हो जाये और सब मिलकर नाचे गाये. हम अपनी जमीन के प्रति
जड़ होते जा रहे हैं . आधुनिकता जरूरी है पर सिर्फ आधुनिकता से कैसे चलेगा काम कि
हम क्या प्लास्टिक की रोटी खाना शुरू कर देंगे?

बहुत-बहुत शुक्रिया सोनम यह पोस्ट लिखने के लिए। इसे पढ़कर काफी अच्छा लगा। हमारे बचपन के दिनों की याद का एक हिस्सा कहानियां भी हैं। अभी तो बहुत सी कहानियां भूल गई है। उनको कहीं एक साथ पढ़ने का मन है।
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