Monday, July 25, 2011

वृद्धावस्था का सुनहरा अतित

भारतीय संस्कृति के अनुसार वृद्धवस्था को एक सम्मानजनक अवस्था माना जाता था। वृद्ध लोगों का समाज में सम्मान करना हमारी परम्परा का एक अभिन्न अंग माना जाता है। मनुष्य का जीवन चार अवस्थाओँ में बँटा होता है, जिसमें वृद्धावस्था की बारी सबसे अंत में आती है। यह जीवन का ऐसा दौर होता है जब मनुष्य जीवन के तमाम अनुभवों का अऩुभव कर चुका होता है। हमारे देश में वर्षों से संयुक्त परिवार की परम्परा चली आ रही हैं जिसमें घर का सबसे बुजुर्गो व्यक्ति मुखिया की भूमिका में होता है। शादी-विवाह हो या फिर कोई भी पारम्परिक गतिविधी भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के आदेश एवं उनके सुझावों को हीं सर्वोपरि माना जाना तय़ था। बुजुर्गों की आज्ञा का पालन करना ना केवल आवश्यक माना जाता था बल्कि उनके आदेशों को सर्वोपरि भी समझा जाता था। माता-पिता और बुजुर्गों के शब्दों का मान रखना संतान अपना कर्तव्य समझते थे। हमारे देश के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिलते हैं जिसमें हम पाते हैं कि संतानों ने माता-पिता के सम्मान और मर्यादा के लिए अपनी खुशियों का तनिक भी ख्याल ना करते हुए बड़ी से बड़ी कठिनाईयों का सामना हँसते- हँसते कर लिया। मर्यादा पुरुषोतम श्री राम ने पिता के वचनों के पालन मात्र के लिए चौदह वर्षों तक वन में जीवन काटा और अनेक प्रकार की कठिनाईयों का सामना किया, नचिकेता, मुनि मारकण्डेय,श्रवण कुमार ये सभी ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने सिद्ध किया कि हमारें यहाँ बुजुर्गों की क्या महत्वता है। हमारे देश की संस्कृति के अनुसार वृद्धावस्था को किसी बिमारी या अभिशाप की तरह नहीं बल्कि एक उपाधि के समान समझा जाता रहा है। वृद्धावस्था को ऐसा माना जाता है कि इस अवस्था में लोग अपना सारा समय सिर्फ खुद को देते है। जीवन के इस अंतिम चरण में लोग अपना सारा समय सिर्फ ईश्वर भक्ति में बिताते थे, क्योकिं जीवन के इस अंतिम भाग में लोग अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाने के बाद मोक्ष की कामना में ईश्वर में लीन हो जाते थे। बड़े-बड़े राजा महाराजाओं की सिर्फ यहीं कामना होती थी की वृद्धावस्था वे अपना उत्तरदायित्व अपने उत्तराधिकारी कों सौंपकर प्रभु भक्ति में अपना शेष जीवन व्यतित करेंगे। पचास वर्ष की अवस्था के बाद वृद्धावस्था में प्रवेश करने के बाद लोग जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करके अपना सारा समय ईश्वर भक्ति में बिताने के लिए लालायित रहते थे।

हमारी संस्कृति के अनुसार माता-पिता की सेवा करना पुत्रो का धर्म माना जाता था, और बुजुर्गों को ऐसा माना जाता था जैसे बुजुर्ग ज्ञान और अनुभव का खजाना हों घर और परिवार वालों से जुड़े हर एक छोटे-बड़े फैसलें में बुजुर्गों के रजामंदी के बजाय कुछ होना संभव नहीं था। आमतौर पर हमारे यहाँ शुरु से यह परम्परा चली आ रहीं है कि जब पुत्र बड़े हो जाते हैं और घर की जिम्मेदारियों का वहन करने लायक हो जाते है तो घर की अधिकांश जिम्मेदारी उन पर आ जाती है। भलें ही सारी जिम्मेदारी और अधिकार पुत्रों के हाथ में हो परंतु बिना माता-पिता की आज्ञा के बिना कोई कदम उठाना अच्छा नहीं समझा जाता था। सांस्कृतिक और पारम्परिक प्रयोजनों में बुजुर्गों के सलाह के बिना कोई कार्य किया जाना संभव नही था, क्योंकि बुजुर्गों को ऐसा माना जाता था कि उनके हाथों में सारी समस्याओं का हल हो। प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को देखें तो हम पाते हैं कि हमारे यहाँ बुजुर्ग महिलाओँ की स्थिति भी बहुत अच्छी रही है। बुजुर्ग महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा बहुत अच्छी होती थी। जिस घर में कोई बुजुर्ग पुरुष नहीं होता था उस घर में उस घर की बुजुर्ग महिला का पूरा वर्चस्व होता था। घर की बहुएं सारे समय सास की सेवा में लगी रहती थी। राजाओं की मृत्यु हो जाने के पश्चात उनकी रानीयों को राजमाता की उपाधि मिल जाती थी और राज्य से जुड़े किसी भी फैसलें में राजमाताओं की भूमिका अहम होती थी।

वृद्धावस्था को जीवन का सबसे आरामदायक भाग माना जाता था, क्योकिं लोगों के अंदर यह सोच थी कि उन्होनें अपने युवावस्था में अपनी संतानों के भरण-पोषण हेतु जो कष्ट उठायें हैं उसका सार्थक फल उनको वृद्धावस्था में जरुर प्राप्त होगा। नाति-पोतों के साथ खेलना और आनंद के पल बिताने का सपना लोग युवावस्था से हीं देखना शुरु कर देते थे। हमारे देश में वृद्धावस्था को का डरावना भाग नहीं बल्कि आनंददायक पल माना जाता रहा हैं। संयुक्त परिवार की परम्परी होने के चलते घर के सारे बच्चे साथ होते थे, बुजुर्गों से काम कराना समाज में बहुत हीं गलत माना जाता था जिस वजह से वृद्धावस्था में ईश्वर भक्ति के अलावा बुजुर्गों के पास और कोई कार्य नहीं होता था। बुजुर्गों को घर का आधार माना जाता था क्योंकि घर के बच्चों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाना और संस्कार देना बुजुर्गों का काम हीं माना जाता था। बच्चों को तरह-तरह की ज्ञान की बातें बताना उनका मार्गदर्शन करना ये सारे कार्य बुजुर्गों की जिम्मेदारी होती थी।

संयुक्त परिवार में दादा-दादी की भूमिक बहुत महत्वपूर्ण रही है। पुराने समय में बच्चे माता-पिता के सानिध्य से ज्यादा अपना ज्यादातर समय दादा- दादी और नाना-नानी के साथ हीं व्यतीत करते थे। जिससे बच्चों को अपनी संस्कृति और परम्पराओँ का ज्ञान भली प्रकार हो जाता था। बुजुर्गों के सानिध्य से बच्चे भारतीय संस्कृति के मूलों के मूलों को भलि-भांती समझ जान पाते थे। SONAM JHA (BHOPAL)

1 comment:

  1. jo hota tha aur hona chahiye wo to aapne bade sargarbhit tarike se samne rakha hai, iske liye aapko badhai,parantu iska wartman sandarbh bhi batayen.

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