Saturday, April 16, 2011

गाँव की ओर

शहरी सर्वे कार्यक्रम समाप्त करने के बाद अब बारी आयी गाँव की ओर रवानगी की इसके लिये तीन जिलों का चयन किया गया था जिसमें खरगोन,सागर और विदिशा शामिल किये गये थे। सबसे पहले हमारी टीम खरगोन की ओर रवान हुयी यहाँ पहले दिन मुझे जो गाँव मिला वो था बरुन जो कि खरगोन ब्लाक में आता है। ये गाँव एक मिश्रित आबादी वाला गाँव है जहाँ हिन्दु,मस्लिम और आदीवासी सभी से मिलने और उनके विचारों को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। इस गाँव के ज्यादातर लोग खुद के व्यवसाय से जुड़े हुये थे। जिसमे दर्जी का काम और मुर्गी पालन ज्यादा देखने को मिला। यह गाँव भी कुछ हद तक हिन्दु बाहुल्य हीं था, क्योंकि मुस्लिम घर हिन्दू घरों की तुलना में कम थे। जब यहाँ के लोगों से हमने बात की तो पाया कि भोपाल शहर की तरह यहाँ के लोगों की भी सबसे बड़ी समस्या पानी और बिजली ही थी। साथ ही हमने पाया यह गाँव हमारी कल्पनाओं से बिल्कुल परे एक गन्दे झुग्गी का स्वरुप लिये हुआ था। गंदी बहती नालियां कचड़े भरे सड़क मानो इस गाँव की बदहाली की कहानी सुना रहें हो। परंतु यहाँ रहने वाले लोग इसी में संतुष्ट नजर आये। बहुत कम लोगों ने हीं बात चीत के दौरान साफ-सफाई की बात उठाई इस गाँव मे कुछ घर हरिजनों के थे और कुछ घर उच्च जाति वालों के परंतु एक बड़ा हिस्सा पिछड़े वर्ग का इस गाँव का हिस्सा था। यहाँ के लोगों से बातचीत करते वक्त हमने पाया कि इन लोगों में परस्पर बहुत घनिष्ठता देखने को मिली हिन्दू मुस्लिम एक साथ विचारों के आदान प्रदान में लगे नजर आये,और यहाँ पूरी तरह सभी समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण व्यवहार देखने को मिला जब हमने यहाँ के मुस्लिम परिवार की महिलाओं और पुरुषो से बात की तो पाया कि यहाँ पर रोजगार की समस्या बहुत जटिल है। साथ हीं ज्यादातर मुस्लिम घरों महिलायें किसी गैर पुरुष के सामने भी नही आ सकती। छोटे-छोटे मकानों में एकसाथ 10-12 लोग रहते है और भरी गर्मी में भी इन मुस्लिम महिलाओं को इतनी इजाजत हासिल नहीं है कि वो खुली हवा में सांस ले सकें। यहाँ के ज्यादातर लोग मजदूरी से अपना जीवन यापन करते हैं परंतु मुस्लिम घरों में मजदूरी के लिये सिर्फ पुरुषों को हीं घर से बाहर जाने कि इजाजत है। पूरे सर्वे के दौरान हमने पाया मुस्लिमों की आर्थीक स्थति हिन्दुओं की तुलना में ज्यादा खराब लगी। जिसके पिछे सबसे बड़ी वजह एक लम्बे परिवार का होना नजर आया। विचारों के मामले मे संकुचित लोग अपने जीवन और रहन-सहन से पूरी तरह नाराज नजर आये तथा साथ हीं इन्होने बताया कि सरपंच जी का सारी समय तो खरगोन में ही बितता है उनके पास यदि कोई समस्या लेकर जाना होता है तो पहले हमे खरगोन जाने के लिये किराये का इंतजाम करना होता है।और हमारी स्थति ऐसी नही है कि हम इतने पैसों का इंतजाम कर पायें। इसी बीच जब हमने यहाँ के हिन्दुओं से बातचीत की तो पाया कि इनकी भाषा निमाड़ी है जो कि हिन्दी,गुजराती और मराठी का समन्वय है। व्यवहार के मामले में बड़े हंसमुख ये लोग खुशदिल नजर आये। जीवन का पल-पल का पूरी तरह आन्नद उठाते ये लोग अपनी गरीबी में भी पूरी तरह खुश नजर आये। इस समुदाय के पुरुष और महिलाएं दोनों खेतों में काम करते हैं और कृषि ही इनके आय का साधन है। इस वर्ग के लोगों मे परदा प्रथा देखने को नही मिला साथ हीं ये लोग आत्मविश्वास से लबरेज लगे। परंतु यहाँ की निमाड़ी महिलाएं धर्म के मामले में कुछ कट्टर नजर आयीं इनको मुस्लिमों से कोई परेशानी नही पर वो बहुत ज्यादा पसंद भी नही हैं। ये लोग एक साथ उठते बैठते जरुर है पर एक दूसरे का छुआ हुआ नही खाते क दूसरे के घर का पानी भी नही पीते। परंतु पुरुषों में इतनी कट्टरता देखने को नही मिली। इस गाँव मे कुछ आदीवासी घर थे जो कि आदिवासियों के सबसे ऊंचे वर्ग दरबान से जुड़े थे। इनको देश दुनिया से कुछ लेना देना नही अपने आप और अपने कृषि में पूरी तरह तल्लीन नजर आये। इसके बाद खरगोन जिले में जो दूसरा गाँव था वो था काबरी यह गाँव भगवानपुरा ब्लाक में आता है। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच स्थित ये गाँव सुन्दरता कि मिशाल लगी। छोटे-छोटे कच्चे और आधे पक्के घरों का ये गाँव स्वच्छता और शालीनता से परिपूर्ण लगा। इस गाँव मे ज्यादातर लोग आदीवासी और कुछ लोग हिन्दु थे। कुछ घर ही इस गाँव में मुस्लिमों के थे। इस गाँव में लोगों के बीच पूरा सौहार्द देखने को मिला। यहाँ के लोगों को एकदूसरे से कोई शिकायत नही तथा ये लोग अपने छोटे-छोटे उधोग धंधो में व्यस्त नजर आये। इन सब के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी मिला जिसका कहना था इस गाँव में शांती की वजह ये है कि यहाँ के मुस्लिम हमारे खिलाफ कुछ नही बोल सकते क्योकिं ये एक हिन्दू बाहुल्य गाँव है। वरना इस जाति के लोगों का विश्वास नही होता। इसके बाद हमने खरगोन से यहाँ कि यादों को समेटे हुये विदा ले लिया। इसके बाद बारी आयी सागर की यहाँ पहुंचकर पहले दिन मुझे जिस गाँव जाने को मिला वो था सेमरा जो कि केसली ब्लाक में स्थित है। एक लम्बे कच्चे सड़क के बाद हमें यह गाँव मिला। यहाँ के लोगों के पास भी खेती और खेतिहर मजदूरी के अलावा कोई काम नही है। यहाँ के युवाओ का ज्यादातर वक्त बैठकबाजी में हीं बीता करता है। इस गाँव में कुछ लोगों ने तो बड़ा सहयोगात्म रवैया अपनाया परंतु ज्यादातर लोग बड़े अनमने भाव से पेश आये। सेमरा गाँव एक ऐसा गाँव है जहाँ ज्यादातर लोग पिछड़े वर्ग के हैं। तथा कुछ घर हरिजनों के है इस गांव में ना तो एक भी घर मुस्लिम का है और ना ही उच्च जाति का। साथ हीं यहां के महिलाओं और पुरुषों का सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान का स्तर बड़ा कमजोर नजर आया। साथ हीं एक बात जो मैने महसूक की यहां की महिलाएं बड़ी दबी और संकुचित नजर आयी घर में हर एक छोटे बड़े निर्णय पुरुषों के द्वारा हीं लिये जाते है। ये महिलायें अपने आप को किसी योग्य नही मानती। इस पिछड़े वर्ग के बाहुल्य वाले गांव मे हमने पाया यहाँ कि हरिजन महिलाएं पिछड़े वर्ग की महिलाओं से ज्यादा सशक्त तथा जागरुप नजर आयीं। यहां से हमें जानकारी प्राप्त हुयी की इस गाँव में हरिजन लोग पिछड़े वर्ग के साथ बराबरी में नहीं बैठ सकते और न हीं उनके नलों से अपने हाथ से पानी ले सकते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों और उत्सवों में भी इनको दूर रखा जाता है। इस गाँव में काम खत्म करने के बाग अगले दिन बारी आयी सागर जिले के पिपरिया चौदह गाँव कि जो कि बंदा ब्लाक में स्थित है। इस गाँव में भी एक बड़ा तबका पिछड़े वर्ग का हीं था तथा साथ में एक हरिजन बस्ती थी जहाँ हरिजनों की एक अलग दुनिया थी। इस गाँव में मात्र पाँच घर हीं उच्च जाति वालों के थे। यहाँ के पिछड़े वर्ग के लोग उच्च जाति के लोगों को बड़ा मान देते हैं तथा उनके साथ उठना बैठना पसंद करते हैं परंतु निचली जाति को बराबरी में बैठने की इजाजत भी नही देते तथा उनके हाथ का पानी भी नही पीते। यहाँ के उच्च् जाति के लोग भी पिछड़े वर्ग से बड़े घुले मिले नजर आये शायद इसकी वजह पिछड़े वर्ग की बाहुल्यता थी। परंतु व्यवहार के मामले में ये उच्च जाति के लोग बड़े टेढ़े नजर आये। जब हमने इस गाँव की हरिजन बस्ती में प्रवेश किया तो पाया कि मानो गाँव का सबसे शालीन हिस्सा यही है। यहाँ से हमें ज्ञात हुआ कि यहाँ पर छूआ-छुत अपने चरम पर है किसी भी सामाजिक उत्सव मे उच्च वर्ग और पिछड़े वर्ग के लोग साथ रहते हैं जबकि हरिजनों को इससे दूर रखा जाता है। इस गाँव के लोग मुस्लिमों को लेकर बड़े कट्टर नजर आये उनका कहना था कि हम तो उनके मजार पर माथा टेकने चले जाते है पर वो कभी भूल से भी हमारे मंदिरो की सीढियां नही चढ़ते ऐसे लोगों से क्या मित्रता ये तो किनारे ही रहें तो हीं हमारी भलाई है। इसी के साथ मेरी ग्रामीण ईलोको का सर्वे कार्यक्रम समाप्त हुआ। जहाँ मैने पाया ग्रामीणों को जितना पिछड़ा समझते हैं वो इसकी तुलना में कई गुना ज्यादा समझादार नजर आये। गाँव में रहने वाले शिक्षा के महत्व को पूरी तरह समझते है परंतु उनके इस समझ के बीच की सबसे बड़ी रुकावट उनकी गरीबी है।

1 comment:

  1. mam ji Report to aapne wakai achchhi likhi hai, kahi kahi grammatical mistakes hai,overall ye bas ek report hi hai, lagta hai ki aapne kafi mehnat kiya hai apne is project pe.mere hisab se (as a reader) agar aap waha ke logo se jure apne aantarik anubhav bi byakt karti to ye padhna aur bhi interesting hota,aur kisi editorial me bhi jane ko taiyar hota.But jo bhi ho aapne overall kafi achchha likha hai.Gr8

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