गुलिस्ता
वो प्यारी और मासूम ऑखें जो बुर्के से ढ़के चेहरे के अंदर से बड़ी मासूमियत से मुझे देख रही थी, तभी यकायक वो मेरे पास आकर बोली मैडम जी आप तो हमको भूल हीं गये कभी फोन भी नही करते अपनी दोस्त को, मै थोड़ी असहज हो गई और शर्मसार हो रही थी कि कोई इतनी मासूमियत से आपको देखे और आप उसको पहचान ना पाए इससे खराब और क्या हो सकता है? उसने जैसे हीं मुझसे दो चार बाते की मुझे याद आया अरे गुलिस्ता सॉरी हम आपको पहचान नहीं पाए. वो मुस्कराई और प्यार से उसने मुझे गले लगा लिया, इतना स्नेह और इतना अपनापन जिसकी कोई सीमा नही, फिर उसने मुझे याद दिलाया याद आया हम पुरानी भोपाल की गुलिस्ता हैं आपने हमारी मोहल्ले की महिलाओ को ट्रेनिंग दी थी. मैने कहा मुझे माफ कर दीजिए गुलिस्ता हम आपको पहचान नही पाए. उन्होने मुझसे कहा कोई बात नही आप हमे भूल गए पर हम सब आपको और आपके मीठी बातों को हमेशा याद करती रहती हैं. हम खूब हसे और हमने अपने सामने दो बसो को जाने दिया जिसका हम दोनो काफी पहले से इंतजार कर रहे थे, हमने खूब सारी बातें की, हमारी और गुलिस्ता की दोस्ती इतनी अच्छी हो गई की गुलिस्ता ने मुझे अपने घर आने को कहा और साथ हीं मुझसे वादा किया कि मुझे कोई खरीदारी करनी होगी तो गुलिस्ता मेरे साथ चलेंगी और सस्ते सब बढ़िया सामान मुझे सीटी बाजार से दिलवा देंगी.
तभी गुलिस्ता की बस आ गई और वो अपने आप को और बुर्के को सम्भालते हुए बस में सवार हो कर चली गई फिर मुझे नही दिखाई दी क्योकि बस खचाखच भरी हुई थी. गुलिस्ता तो चली गई पर मैं उनकी उस बात को याद करती रही आखिर मैने क्या मिठे बोल बोले होंगे जो गुलिस्ता को इतने प्यारे लग गए और उनका मुझसे इतना अपना पन हो गया. मैने तो अपनी नौकरी की थी जिसमें मुझे महिलाओं के साथ उनसे जुड़े मुद्द्दो और समस्याओं पर बात करनी होती है. और इन बातो में ऐसी कौन सी मीठी बात होगी, सोचते- सोचते मेरी भी बस आ गई मैं भी अपनी बस में सवार हो गई पर मेरा मन अभी भी गुलिस्ता और उनकी बातों मे उलझा रहा मुझे याद आया गुलिस्ता ट्रेनिंग में आई थी और साथ में उसकी ताई भी आई हुई थी उन्होने ही मुझे बताया था गुलिस्ता के दो बच्चे हैं और उसके आदमी ने उसको तालाक दे दिया है क्योंकि गुलिस्ता ने अपने पति से शिकायत की थी कि वो अपनी पति के हाथो तो पिटती हीं है पर वो अपने ससुर की गालियॉ नहीं सुनेगी आखिर ससुर वालिद होते हैं और उनके मुंह से गन्दे शब्द सुनकर उसका शरीर सिहर जाता है, पति इतना नही कमाता की वो घर और अपनी बेगम का खर्चा उठा सके फिर गुलिस्ता ससुर की गालियों और उनकी गंदी नियत जो हमेशा गुलिस्ता पर बनी रहती है इसकी शिकायत वो किससे करे? एक दिन ऐसे हीं किसी मामले ने तूल पकड़ा और गुलिस्ता को उसके आदमी ने तालाक दे दिया.
गुलिस्ता को घर से निकाल दिया अब गुलिस्ता अपने मायके में रहती हैं जो पहले उनका घर था, जगह वही है लोग वही हैं बस अब रिश्तों के मायने बदल गए हैं पहले वो घर की बेटी थी पर अब वो एक छोड़ी हुई औरत की हैसियत से रह रही हैं जिसके एवज में उन्हे ताने और कठोर शब्द चुपचाप सहन करने होते हैं, घरो में चोरी-चोरी और छिपा- छुपा के वो चौका बर्तन का काम तो करती हैं पर उससे इतनी कमाई नही हो पाती है कि उससे गुलिस्ता और उनके बच्चो का गुजारा हो सके, गुलिस्ता की जिन्दगी में अब कोई गुल नही बचा है दूर तलक रेत हीं रेत है, इन तमाम दर्द को अपने सीने छुपा कर मेरी दोस्ता हमेशा मुस्कराती रहती है, क्योंकि उसकी इस दोयम स्थिति के लिए सिर्फ गुलिस्ता और उनकी फूटी किस्मत जिम्मेदार है, उनके माता- पिता की कोई गलती नही जिन्होने बेटे- बेटियो की कतार लगा दी और सभी बेटियो को किस्मत के भरोसे नालायको के साथ मढ़ दिया,
वालिद होने के नाते 15 साल की उम्र तक पाला-पोषा और अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, भाई ने अपनी लुगाई के दुपट्टे में मुंह छिपा लिया है और गुलिस्ता से एकदम बात नही करता की कही वो पैसे ना मांग ले कोई समस्या ना सुना दे. और वो नालायक पति तो दूसरी औरत ले आया है, किसी की कोई गलती नही गुलिस्ता की किस्मत खराब हैं.
अब गुलिस्ता किसी 'आंदोलन' के साथ जुड़ जाए तो बदचलन करार दी जाएगी। समाज अपनी बरबादी की पटकथा खुद लिख रहा है।
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