ऑगन के बीचो- बीच बना तुलसी चौरा
अब रहने लगा है खाली चापाकल का चबूतरा
बूढी बा दीवार से सटकर किवाड़ के पास
बैठी रहती है पहर भर और दोपहर भर
नही खनकती हैं अब चूड़िया
ना हीं आवाज आती है झगड़ने की ना हंसने की
ना चिल्लाने की
ना हीं आती है आवाज बर्तनों के टकराने की
सांय सांय करती आवाजें घुमा करती हैं
और पैर पसारे बैठी रह्ती है घर भर में
बा अपनी खाली ऑखों
से निहारती रहती है
बंगलिया सड़क को और उठ दौर जाती है
आंगन के बाहर दालान पर
जब वो सुनती है किसी रिक्शे, तांगे या टेम्पो की आवाज
और बार- बार और कई बार करती है ये आवाज करती हैं उसको निराश
बस कभी-कभी वो डाक बाबू आते हैं साईकिल की घंटी टनटनाते हैं
और बा को चंद कागज के टुकड़े थमा जाते हैं
जिन्हे वो कई तहो में मोड़कर बांध
लेती है अपनी साड़ी की खूंट से
पर वो अभी भी निहारती रहती है बंगलिया
सड़क को
और हर रोज धूप दिखाती है अचार के
मर्तबानो को
वो लिखवाती है पाती महिने में कई
बार और उसे मिलता
है जवाब कभी कभार
परेशानियों, मुश्किलों से भरे जवाब कर देते हैं उसको
बहुत ज्यादा परेशान और वो हो जाती
है उदास और निराश
फिर वो पहर भर और दोपहर भर बैठी
रहती है
बेना डोलाती हुई दिवार से सटकर किवाड़
के पास.
---------------------सोनम-----------------------
बहुत सुंदर और दिल को छू लेने वाली कविता है ये. किसी अपने के दूर होने का दर्द क्या होता है, वह भी उस उम्र में जब न तो शरीर साथ देता है और न ही कोई आपकी खबर लेने को ज्यादा ललायित होता है, इस कविता को पढ़ कर कोई उस दर्द का अनुभव कर सकता है.
ReplyDeleteइस कविता को लिखने के लिए भेंट स्वरुप यह चार लाइन:
दर्द को महसूस करके शब्दों में डालना
बड़ा कठिन था और रहेगा.
लेकिन किसी की आत्मा आप जैसी हो तो
हर दर्द कविता में यूं ही बह चलेगा.
ऑल द बेस्ट
ReplyDeleteThanks Shailesh :-)